Tuesday, July 4, 2017

अंकित साहिर की कविताएं

आलोचनाएं आमंत्रित है।

 अँधेरे के दौर में

 अँधेरे के दौर में जब सारी मशालें बुझ जाएँगी
और जब नहीं होगा कोई भी नामो-निशाँ,
उजाले का,
मैं तब भी मिलूंगा तुम्हे इसी तरह लड़ते हुए
उजाले के लिए अँधेरे के खिलाफ
हाँ अँधेरा घना तो होगा मगर
इतना भी नहीं की बुझा दे उम्मीदों को
हाँ तूफान तेज़ तो होगा मगर
 इतना भी नहीं की उड़ा दे हौसलों को
 तुम साथ आओ न आओ मैं परचम उठाऊंगा
 तुम साथ गाओ न गाओ मैं बरबत पर गाऊंगा
और जब दौर होगा सबसे गहरे अँधेरे का
नज़र नहीं आएगा कुछ भी
सिवाय अँधेरे के
सुनाई नहीं देगी कोई आवाज़
सिवाय ख़ामोशी के
 मैं तब भी मिलूंगा तुम्हे
इसी तरह अपने गीत गाकर।

 जीतेगी ये जिंदगी

जीतेगी ये ज़िन्दगी
जीतेंगे ये जंग हम
 न होंगी कोई बंदिशें
होंगें सब विषम ये सम
दिलो में जो धधक रही
वो आज़ादी की आग है
 मशाल है, चिराग है
वही तो अपना ख्वाब है
 कीमत होगी आंसुओ की
 गम भी तब ये होंगें कम
जीतेगी ये ज़िन्दगी
 जीतेंगे ये जंग हम
न होंगी कोई बंदिशें
होंगे सब विषम ये सम...

आप मरे नहीं हैं

आप मरे नहीं है
मगर इसका मतलब ये नहीं
की आप ज़िंदा है
अगर आपको नंगा नहीं करता
किसानों का नंगापन
अगर नहीं जगता आपका ज़मीर
नरमुंडों की माला पहनें,
किसानों को देखकर
अगर नहीं विचलित होता, आपका मन
 मुहँ में चूहे दबाएं,
दारूण चेहरों को देखकर
अगर नहीं चीत्कार करता, आपका ह्रदय
गले में फंदा डालें ज़िंदा लाश बनते लोगो को देखकर,
अगर आप सब कुछ सह लेते है,
ऐसे ही चुपचाप,
अगर नहीं सुलगती आपमें,
विद्रोह की एक चिंगारी भी,
तो तय है कि आप मरे नहीं है
मगर इसका मतलब ये नहीं
कि आप ज़िंदा है...

वख्त आ चुका है

वख्त आ चुका है
अब उन्हें बता दिया जाना चाहिए
की हम एकलव्य नही
 की कोई द्रोणाचार्य हमारा अंगूठा काट ले
हम शम्बूक नही
की कोई राम हमारी गर्दन काट दे
उन्हें पता होना चाहिए
की अब छाती उनकी होगी
और पैर हमारे होंगे
अब गर्दन उनकी होगी
और हाथ हमारे होंगे
वख्त आ चुका है
अब उन्हें बता दिया जाना चाहिये।

 इंकार

लो इनकार करती हूँ मैं
 तुम्हे सर्वशक्तिमान मानने से
तुम्हारी सत्ता के अनुष्ठान से
तुम्हारी आत्मवंचना के अमुमोदन से
 पर तुम पर टूट पड़कर नहीं,
बल्कि खुद को मुक्त करके
तुम्हारी अपेक्षाओं को पूरा करने की अभिलाषा से
और यकीन मानो
ये बस मेरी मुक्ति नहीं होगी
मेरे साथ आज़ाद होगे तुम भी...
(बीएचयू में महिला महाविद्यालय की छात्राओं के आंदोलन के समर्थन में।)

 तुम्हारा डर

अरे तुम तो डर रहे हो,
ठीक वैसे ही , जैसे डरे थे कल,
तुम, शम्बूक से या एकलव्य से
 या फिर रोहित से,
 देख रहा हूँ, मैं फिर वही डर
आज तुम्हार आँखों में,
 बड़ी-बड़ी फौजे,
दौलत असबाब सब कुछ ही तो है
तुम्हारे पास
फिर क्यों इतना खौफ मुझसे,
इसलिए की, कहीं इक दिन मै ,
 तुम्हारे बराबर न पहुँच जाऊं
या आगे न निकल जाऊं तुमसे,
 तुम्हे पीछे छोड़कर,
उन तमाम वंचनाओं के बावजूद,
जो दी है तुमने, मुझे,
मेरे जन्म के साथ
 उन तमाम अपात्रताओ के बावजूद,
जो थोपे तुमने मुझपर,
मुझे रोकने के लिए,
 मुझे घृणित बनाये रखने के लिए,
तुम्हे डर है ना की कहीं विध्वंस न कर दूँ,
 मैं तुम्हारे महलो का ,
जिसे रंगा है तुमने, शम्बूको के खून से
जिसकी नींव डाली, एकलव्यों के अंगूठो पर
जिसकी दीवारे सजाई, रोहितो की लाशो से
बाहर आकर देखो अपने महलो से,
कैसे शम्बूको के कटे सिरों से रिसता खून
दौड़ा चला आ रहा है, ज्वार की शक्ल में,
तुम्हारे महलो की ओर,
 कैसे एकलव्यो के अंगूठे खोद रहे है,
 तुम्हारे महलो की नीवों को,
कैसे रोहितो के चीत्कार, बेध रहे है,
 तुम्हारे महलो की दीवारों को,
 बुलाओ अपनी सारी फौजे
और रोको इन्हें
देखो इन्होंने डरना बंद कर दिया है,
 देखो मैंने डरना बंद कर दिया है
इसी बात का डर है ना तुम्हे,
तो ठीक है, तुम्हे डरना चाहिए...

 माँ कामरेड

माँ तुम भी तो कामरेड हो
तो आओ ना लड़ते हैं
तुम्हारी आज़ादी के लिए
तुम्हारी गुलामी के ख़िलाफ़,
 नहीं, ये जंग नहीं हैं पापा के ख़िलाफ़
 या घर के और मर्दों के ख़िलाफ़
ये जंग तो है, पितृसत्ता से
हमें तो लड़ना है,
मर्दवादी सोच के खिलाफ
तुम्हारी आज़ादी के लिए
 तुम्हारी गुलामी के खिलाफ
तो आओ ना कामरेड लड़ते हैं...

आवाम और अंजाम

अब तुम और दबा नहीं सकते
इंक़लाब के नारों को
अपने बूट के खौफ से
अपनी सारी फौजों से
सारे बंदूकों और तोंपो से
सबसे बड़े साम्राज्य भी
एक दिन ज़मींदोज़ हो गए
हमने उन्हें भी नेस्तनाबूद होते देखा
जिनका दावा था
अपने सूरज के कभी न डूबने का
हमने उनका भी अंजाम देखा
जिनका दावा था
 अपने खुद के आइन होने का
और मैं देख रहा हूँ
वही डर आज तुम्हारी आँखों में
तुम डर रहे हो
अपने तख्त और ताज़ के धराशायी होने से
अपने ऊँचे ऊँचे महलो के ढहा दिए जाने से
तुम हमेशा से डरते रहे हो गरीबों से,
मज़्लूमो से मेहनतकश आवाम से
और यक़ीन मानों
 तुम्हारा डर एक दिन सच साबित होगा
और नेस्तनाबूद हो जायेगा
 तुम्हारा भी इक़बाल
ज़मींदोज़ हो जायेगी
तुम्हारी भी मसनद
क्योंकि फ़ौजें ख़त्म हो जाती हैं
मगर आवाम कभी ख़त्म नहीं होती...

 सब बदल जायेगा

सब कुछ बदल जायेगा उस दिन
जब तोड़ दोगी तुम
अपने हाथों की चूड़ियाँ
 जब निकाल फेकोगी तुम
अपने पैरों के पायल,
 बिछिये जब उतार फेकोगी तुम
अपने गले में पड़ा मंगलसूत्र
जब इंकार कर दोगी तुम
अपनी मांग में कोई भी सिंदूर भरने से
और ऊंची आवाज़ में एलान करोगी
की तुम भी इंसान हो,
उसी बराबरी के साथ
जैसे इंसान है सारे मर्द
बिना चूड़ियां पहने बिना पायल
 और बिछिया पहनें बिना डाले मंगलसूत्र गले में
और बिना लगाये कोई सिंदूर मांग में
सब कुछ बदल जायेगा उस दिन
जब नकार दोगी तुम उन सारे धर्मों को
उन सारे ईश्वरों को
जिन्होंने कभी कुछ नही दिया तुम्हे
 सिवाय गुलामी के,
दोयम दर्जे की ज़िन्दगी के
जब बारूदी सवाल होंगे तुम्हारे लबो पर
जो ध्वस्त कर देंगे
पितृसत्ता के किलों को
जब गगनभेदी नारे लगाओगी तुम
 बराबरी और न्याय ज़िंदाबाद के
 जब मांगोगी तुम अपना हक
और अपनी आज तक की गयी मेहनत का हिसाब
 जब ऐलान कर दोगी तुम
अपने आज़ाद वजूद का
और कह दोगी,
की तुम किसी की मिलकियत नहीं
सब कुछ बदल जायेगा उस दिन...

 कवियों का हिसाब

इतिहास जब कवियों से हिसाब मांगेगा
तो उनसे ये नहीं पूछा जायेगा
के तुम्हारे गीतों ने
कितने जवां दिलों में मोहब्बत का एहसास जगाया
या कितनी जादूगरी से ज़िक्र किया
तुमने अपनी महबूब की खूबसुरती का
उनसे पूछा जायेगा की
की क्यों तुम तब भी मोहब्बत का बयान लिख रहे थे
 जब तुम्हारे सामने क़त्ले आम जारी था।
जब तुम्हारे सामने हड्डिया निकले
पिचके गाल वाले लोग मर रहे थे भूख से
 तब तुम्हें कैसे नज़र आ रही थी
अपने महबूब की ख़ूबसूरती
उनसे पूछा जायेगा
के तुम्हारे गीतों ने कितने
बुझते हुए आँखों में उम्मीद की आग जलाई
के तुम्हारे गीत सुनकर कितने शोले भड़के
कितने हाथ उठे हथियारों के साथ
उनसे पूछा जायेगा
के क्या तुम तब भी गा रहे थे
आज़ादी के गीत
जब बरसाए गये थे कोड़े
 तुम्हारे पीठ पर सरे आम किसी भीड़ भरे चौराहे पर
क्या खामोश तो नहीं हो गए थे तुम
फौजी बूटों की आवाज़ सुनकर
या तुम तब भी सीना ताने खड़े थे ऐसे ही
अपने सामने तनी हुई बंदूकों के खिलाफ
उनसे पूछा जायेगा की
जब जकड़ दिया गया था तुम्हें जंजीरों में
किसी अँधेरी काल कोठरी में
क्या तब भी तुम्हारें लबों पर इंक़लाब के नारे थे
क्या तुमनें बनाया था अपने गीतों का मशाल
और भड़कायी थी आग
अँधेरे के ज़मींदोज़ होने तक
इतिहास जब कवियों से हिसाब माँगेगा ।

यलगार

तुम ज़ारी रखों ज़ुल्मों-सितम
हम यलगार ज़ारी रखते है,
तुम ज़ारी रखना दौर-ए-वहम
हम ललकार ज़ारी रखते है,
तुम सब ओर अंगारे बिखराओ
 हम बरसात जारी रखते है,
तुम ज़ारी रखो जुल्मो-सितम
 हम यलगार ज़ारी रखते है...

लाल सलाम

लडेंगे हम मिलकर के साथी
नया इतिहास बनाने को
लड़ेंगे हम मिलकर के साथी
ज़ुल्मो-सितम मिटाने को
तुम ललकार लगाना साथी
मैं परचम फहराऊँगा
तुम भी आग लगाना साथी
मैं मशाल बन जाऊँगा
और फिर मिलकर के
गीत हम आज़ादी के गाएंगे
और लाल सलाम
और लाल सलाम
और लाल सलाम दोहरायेंगे...