Tuesday, November 21, 2017

एक और सब्बीरपुर जो सब्बीरपुर नहीं बन सका।

बलिया(उ.प्र.) के श्रीनगर गाँव में दलितों पर हुए हमले की तथ्यान्वेषी रिपोर्ट
यह रिपोर्ट ग्राम विकास मंच से विनोद मित्रा और मनोज, जाति उन्मूलन मोर्चा (CAF) से हेमंत कुमार और जनमुक्ति मोर्चा से राजेश द्वारा 16-17 नवम्बर 2017 को किये गए श्रीनगर गाँव के दौरे के आधार पर बनाई गयी है|
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   बलिया (उ.प्र.) से लगभग 35 कि.मी. की दूरी पर बैरिया थाना क्षेत्र में श्रीनगर गाँव है| श्रीनगर गाँव में दलित बस्ती के पास एक छोटा सा अदभुत बाबा का मंदिर है, मंदिर के बगल में एक पुराने बंद पड़े स्कूल का कमरा है| जांच टीम पहले दलित बस्ती में गयी, जहाँ के फूलनाथ ने बताया कि इस कमरे की छत पर 9 नवम्बर 2017 को दोपहर 2 बजे पांच दलित लड़के फूलनाथ उम्र 27 वर्ष, सूरी उम्र 19 वर्ष, लालबाबू उम्र 21 वर्ष, राहुल उम्र 17 वर्ष और शैलेन्द्र उम्र 21 वर्ष मौजूद थे| इसी समय तीन राजपूत लड़के रवि सिंह उम्र 25 वर्ष, सोनू सिंह उम्र 22 वर्ष और विशाल सिंह उम्र 24 वर्ष आये और दलितों को बोले कि उस जगह से चले जाएँ| दलित लड़के कुछ देर बैठे रहे| फिर रवि सिंह ने गाली गलौच करते हुए कहा कि “भोसड़ी के चमार, यह मंदिर तुम्हारे बाप का नहीं है, चले जाओ यहाँ से”| दलित लड़के मंदिर की छत से नीचे उतर गए| रवि सिंह और उनके दोस्तों ने कमरे की छत पर कुछ देर गांजा पीने के बाद नीचे उतर कर कहा कि “तुम सब को आज हम उठवा लेंगे, जाकर अपनी माँ की साड़ी में छुप जाओ”| फिर वे चले गए| दलित लड़कों ने इसे सामान्य तौर पर लिया और किसी को कुछ बताया नहीं|
      जांच टीम से दलित बस्ती के लोगों से बातचीत के दौरान बस्ती के कई लोग मौजूद थे| वहां बसपा के स्थानीय नेता लल्लन राम ने बताया की एक घंटे बाद गाँव की पश्चिम दिशा से 25-30 की संख्या में राजपूत आये| इनके सिर पर भगवा गमछे बंधे थे| राजपूत तलवार, गुप्ती, रिवाल्वर, छूड़ा, डंडे, हॉकी जैसे हथियार लिए हुए थे| वे अदभूत बाबा के मंदिर पर आये, और वहाँ पूजा किया| माथे और तलवारों पर टीका किया, जय दुर्गा और जय श्री राम के नारे लगाये| भद्दी और जातिसूचक गाली गलौच करते हुए दलित बस्ती पर हमला कर दिया| इस समय बस्ती के ज्यादातर लोग मजदूरी करने गए हुए थे| जो लोग मिले उन्हें मारा पीटा गया|
   फूलनाथ ने बताया कि सबसे पहले लालबाबू पर लाठी और हॉकी से हमला किया गया है| फिर लल्लन राम जो बसपा के स्थानीय नेता है बातचीत के उद्देश्य उनकी तरफ गए| लल्लन राम के सिर पर तलवार से हमला किया गया, गिर जाने पर डंडे, हॉकी से मारा गया, जिससे पेट आर गहरी चोट लगी और दोनों हाथ टूट गए| फिर हमलावर रेलवे लाइन के पास गए, जहाँ से पत्थर बाजी करने लगे| लल्लन राम को उठाने आये लोगो को पत्थरों से चोट लगी|
फूलनाथ ने बताया कि गाँव के पूरब में लक्ष्मण मठ पर करीब 100 की संख्या में चार उच्च जातियां भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत और गोस्वामी का एक दूसरा गुट जमा था, जिसने दलित बस्ती पर दूसरी तरफ से हमला किया| दलितों को घर में घुस कर मारा पीटा गया| कुछ झोपडिया उजाड़ी गयी और आग लगाने का प्रयास किया गया| आग को सवर्णों द्वारा खुद ही बुझा दिया गया| झगडा समाप्त होने पर रवि सिंह, विशाल सिंह और अन्य यह धमकी देकर गए कि “दो लोग अभी बाकी हैं, हम दोबारा आयेंगे”| यह सब होने के एक घंटे बाद पुलिस और विधायक सुरेन्द्र सिंह गाँव में आये|
FIR और पुलिस का रवैय्या: 9 नवम्बर की शाम को ही SC/ST अट्रोसिटी  एक्ट के तहत 19 लोगों पर मुक़दमा दर्ज किया गया| दलितों का आरोप है कि FIR कमजोर बनाया गया है| इसमें हमलों के दौरान तलवार और बंदूकों के इस्तेमाल को शामिल नहीं किया गया है| पुलिस द्वारा बताई गयी कहानी मानने के लिए मजबूर किया गया है| FIR को देखकर जांच टीम ने यह पाया कि हमले को पैर पर बताया गया है और तलवार से हमले का जिक्र नहीं किया गया है| धारा 307 और 308 लगाये जाने के बजाये मुकदमे में कमजोर धाराएँ जैसे 147, 148, 149, 452, 323, 504   लगायी गयी हैं|
SC/ST अट्रोसिटी एक्ट लगने के बाद भी आरोपियों की गिरफ्तारियां नहीं हुईं है| एक व्यक्ति रवि सिंह ने खुद गिरफ़्तारी दी है| लल्लन राम का कहना है कि भाजपा सांसद भरत सिंह और भाजपा विधायक सुरेन्द्र सिंह ने थाने में दबिश बनायीं है कि कोई गिरफ़्तारी नहीं होनी चाहिए| इसीलिए गिरफ्तारियां नहीं हो रही है| 
मेडिकल रिपोर्ट: नजदीकी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, रेवती में हमले के दिन एक भी डॉक्टर मौजूद नहीं था| लल्लन राम का आरोप है कि उन्हें जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया था| BSP नेता ओमकार चौधरी के आने पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, सोनबरसा में मेडिकल जांच हुई| गंभीर रूप से घायल लल्लन राम को जिला अस्पताल भेजा गया|
17 नवम्बर को जांच टीम वर्मा बस्ती में गयी जहाँ किसी ने बात नहीं की| सवर्ण जातियों से तनावपूर्ण और खौफजदा माहौल होने की वजह से बातचीत नहीं हो पाई| पुलिस से भी जांच टीम बात नहीं कर पाई| लेकिन पुलिस द्वारा लिखित FIR गाँव के लोगों द्वारा जांच टीम ने प्राप्त किया|



चोटों का विवरण: 
इस जातीय हिंसा में कुल 13 लोगों को छोटी बड़ी चोटें आई है| पीड़ितों द्वारा बताया गया विवरण इस प्रकार है-
लल्लन राम- लल्लन राम सिर पर चोट है, तलवार से हमला किया गया है| दोनों हाथ टूटे हैं| पेट में गहरी चोटे हैं| पैर में कटने के निशान है|
लालबाबू- हॉकी और डंडे से मारा गया, तलवार से हमला किया गया| 
गीता देवी – तीन बार तलवार से हमला किया गया, पत्थर से चोट लगी है|
फूलनाथ- लाठी और डंडे से मारा गया|
अस्पति देवी- पेट और कमर पर पत्थर से चोट|
कलावती देवी- पत्थर से चोट|
बैजनाथ- पत्थर से चोट|
लगनी देवी- पत्थर से चोट|
कंचन देवी- पत्थर से चोट|
लक्ष्मण राम- छाती पर चोट, धक्का देकर गिराया गया|
विद्यावती देवी- पैर पर पत्थर से चोट|
रूदल राम- कमर पर चोट|
अशोक राम- हॉकी और पत्थर से पेट और पैर में चोट|

निष्कर्ष-
सहारनपुर, खगडिया और देश के अन्य हिस्सों में हो रहे दलित उत्पीडन की ही कड़ी में ही, दलितों पर हुए इस हमले को देखा जाना चाहिए| यह हमला सिर्फ इसीलिए हुआ कि वे दलित हैं, और सवर्ण जाति के लोग ग्रामीण इलाकों में अपना वर्चस्व बनाये रखना चाहते हैं| 
पुलिस का देर से आना, FIR को कमजोर किया जाना, मेडिकल जांच सही ढंग से ना होना, मीडिया द्वारा आधी अधूरी खबरें देना और FIR के बाद भी पुलिस द्वारा कोई भी कार्यवाही नहीं किया जाना यह दर्शाता है की इस घटना में दलितों के साथ सम्पूर्ण राज्यतंत्र ने शत्रु जैसा व्यव्हार किया है|
दलित उत्पीडन की अन्य सभी घटनाओं की तरह बलिया की यह घटना भी बताती है कि सवर्ण जातियां हथियार बंद हैं और मनुवादी हिंदु फासीवाद का उभार इसको और भी हिंसक बना रहा है|
गाँव में अभी भी खौफ का माहौल है और दोबारा ऐसा हमला होने की आशंका बनी हुई है|
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Friday, November 17, 2017

बिरसा मुंडा से लेकर साईं बाबा तक



भगत सिंह छात्र मोर्चा  ने बिरसा मुंडा के 142 वे जयंती पर एक परिचर्चा का आयोजन किया।जिसका विषय- संसाधनों की लूट और इसके खिलाफ आन्दोलन(बिरसा मुंडा से लेकर साईं बाबा तक) था।
बी.एच.यू के मधुबन में यह परिचर्चा 15 नवंबर 2017 को दोपहर 2 बजे से शाम 5 बजे तक चली।
जिसमे वि.वि. के लगभग 20 छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया। गाँव छोड़व नहीं,जंगल छोड़व नहीं गीत भी गाये गये।

परिचर्चा में उपस्थित bcm के सचिव विनोद शंकर ने बिरसा की एक संक्षिप्त जीवनी बताई और आज जल-जंगल-जमीन के चल रही व्यापक आन्दोलन को ही बिरसा मुंडा के आन्दोलन का उन्नत रूप बताया। जिसे आज भारतीय सरकार नक्सल आन्दोलन कह कर आदिवासियों का दमन कर रही है।
आगे दुसरे साथियों में इसी में जोड़ते हुए कहाँ की
आदिवासियों का यह आन्दोलन सिर्फ उनके जीने-मरने का आन्दोलन नहीं बल्की पूरी मानवता को बचाने का आन्दोलन है।
जिस तरह अंग्रेजो के द्वारा बिरसा मुंडा को जेल के अंदर जान से मार कर उनके आन्दोलन को खत्म करने की कोशिश की गई थी उसी तरह जी.एन. साईं बाबा के साथ किया जा रहा है।
मालूम हो की साईं बाबा 90% विकलांक है,जिसे कोर्ट द्वारा आजीवन कारावास दिया गया है। ये बिलकुल गैर-मानवीय व्यवहार है। साथ ही साथ सभी ने एक समझदारी बनायीं की साईं बाबा को जल्द से जल्द रिहा करना चाहिए।
संसाधनों की लूट के लिए मध्य भारत में  ये सरकार सेना और हथियार के दम पर आसिवासियो की हत्या,बलात्कार,मार-पिट कर रही है।
ताकि वो डर जाय और उनके लिए रास्ता साफ़ कर दे।
इसी के खिलाफ लाखों- लाख आदिवासी एक जुट होकर इसके खिलाफ लड़ भी रहे है।
कुल मिलाकर आज मध्य भारत में भारतीय अर्ध-सैनिक बलों और आदिवासियों के बीच एक भीषण युद्ध चल रहा जिसे ये सरकार लड़ तो रही है पर आम जनता को बताने से बच रही है।
जिन सैनिको को देश की सीमा पर होना चाहिए उन्हें बड़े-बड़े पूंजीपतियों के लिए प्लांट और कच्चा-माल उपलब्ध कराने के लिए आदिवासियों के खिलाफ खड़ा कर दिया गया है।
आज हम सभी यूनिवर्सिटी में पढने वाले विद्यार्थियों-नौजवानों को सरकार के इस कदम का विरोध कर वहां से सैनिक हटाने और आदिवासियों के ऊपर ढाहे जारे जुर्म को जल्द से जल्द समाप्त करने की की मांग की जानी चाहिए।

क्योंकि जब जंगल-नदी-पहाड़ बचेगें तब ही पूरी मानवता बचेगी।आज हम आये दिन प्रदुषण की समस्या और इस से होने वाले मौत के बारे सुनते रहते है।
इसलिए बिरसा मुंडा की लड़ाई और आज मध्य भारत में आदिवासियों की दोनों लड़ाई एक ही है।जबकी आज की लड़ाई पहले के अपेक्षा और उन्नत-बड़ी लड़ाई है क्योकी आज उनके पास समजावाद और साम्यवाद नामक वैज्ञानिक-दर्शन है। जो पूरी मानवता की मुक्ति का दर्शन है।

लड़ो पढाई करने को- पढो समाज बदलने को!
हुल जोहर!   
इन्कलाब जिंदाबाद!   
जल जंगल जमीन की लड़ाई जिंदाबाद!

Saturday, October 28, 2017

दलित पैंथर का घोषणापत्र










  

साईबाबा ने जेल से लिखा पत्नी को पत्र, कहा मैं यहां जिंदगी की आखिरी सांसें ले रहा हूं

शोषित - दलित के पक्ष में खड़ा होना ही इस जनविरोधी, फासीवाद के पोषक सत्ता को सबसे बड़ा जुर्म नजर आता है। शोषितों के हक में आवाज बुलंद करनेवाले प्रोफेसर साई के साथ ( जो कि शारिरिक रूप से 90% अक्षम हैं ) जेल मे जानवरो सा बर्ताव किया जा रहा है।
स्वास्थ्य बिगड़ने के बाबजूद कोई सेवा उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है। बुखार होने और ठंड से कांपने के बावजूद न तो उन्हें एक कंबल उपलब्ध कराया जा रहा है न ही पहनने के लिए ही कोई गर्म कपड़ा ।इनका स्वास्थ्य बदतर होता जा रहा है ।यह सब इन्होने जेल से अपनी जीवनसाथी को लिखे पत्र में बताया है। आमजन के साथ खड़े होने वाले प्रोफेसर साईं के लिए आज सभी बुद्धिजीवियों और जनवादियों को आवाज उठाने की जरूरत है।
                       -जनज्वार से हिंदी में

प्रिय वसंता
मुझे दस्तक दे रही सर्दियों के बारे में सोचकर ही डर लग रहा है। पहले से ही मुझे लगातार बुखार बना हुआ, परेशान हूं मैं बुखार से। मेरे पास सर्दी से बचाव के लिए एक कंबल तक नहीं है। न ही मेरे पास स्वेटर या जैकेट पहनने के लिए है, जिससे कि मैं ठंड से अपना बचाव कर सकूं। जैसे—जैसे ठंड दस्तक दे रही है मेरे पैरों में और बाएं हाथ में लगातार दर्द बढ़ता जा रहा है।

नवंबर से शुरू होने वाली सर्दी के दौरान मेरे लिए यहां सर्वाइव करना लगभग असंभव जैसा है। मैं यहां उस की तरह जी रहा हूं, जो अपनी अंतिम सांसों के लिए संघर्ष कर रहा हो। मैंने यहां किसी तरह ये 8 महीने बिताए हैं। लेकिन मुझे नहीं लगता कि ठंड में मैं यहां जीवित रह पाउंगा। इस बात का मुझे पूरा यकीन है। मुझे नहीं लगता कि मुझे और ज्यादा अपने स्वास्थ्य के बारे में लिखने की जरूरत है।  
कृृपया किसी भी तरह इस महीने के आखिर तक या इससे पहले किसी वरिष्ठ वकील को मेरे केस को देखने के लिए फाइनल करो। मिस्टर गाडलिंग को मेरी जमानत अर्जी नवंबर के पहले हफ्ते या अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में ही तैयार करने को कहो। तुम्हें पता है कि अगर मेरी जमानत नहीं हुई तो मेरी स्वास्थ्य की स्थिति आउट आॅफ कंट्रोल हो जाएगी। इसके लिए मैं जिम्मेदार नहीं होउंगा। अब मैं इस बारे में आगे से तुम्हें कुछ और नहीं कहूंगा।
तुम्हें मेरी स्थिति के बारे में रेबेका जी और नंदिता नारायण से बात करनी चाहिए। इस बारे में प्रोफेसर हरगोपाल और अन्य लोगों से भी बात करो। उन्हें पूरी स्थिति समझाओ। प्लीज जल्दी कुछ करो। मैं बहुत डिप्रेस्ड हूं। इस निराशा में मुझे लगता है कि मेरी हालत एक ऐसे भिखारी की तरह हो गई है जो बिल्कुल बेसहारा है। लेकिन आप में से कोई भी एक इंच नहीं चल रहा है, कोई भी मेरी स्थिति को समझ नहीं पा रहा है।
मुझे लगता है कि कोई भी मेरी स्थिति नहीं समझ पा रहा है। नहीं समझ पा रहा है कि एक 90 प्रतिशत विकलांग व्यक्ति कैसे इस स्थिति में एक हाथ से संघर्ष कर रहा है, जो कई बीमारियों से पीड़ित है। कोई भी मेरी ज़िंदगी की परवाह नहीं करता है। यह सिर्फ एक आपराधिक लापरवाही है, एक कठोर रवैया है।
तुम अपना भी ध्यान रखो। तुम्हारा स्वास्थ्य मेरा और पूरे परिवार का स्वास्थ्य है। इस वक्त तुम्हारे अलावा कोई दूसरा तुम्हारा ख्याल रखने वाला नहीं है।
जब तक मैं नहीं हूं, तब तक तुम्हें बिना किसी लापरवाही के अपनी खुद ही देखभाल करनी होगी।      

 बहुत सारा प्यार 
तुम्हारा 

साई

Sunday, October 22, 2017

बीएचयू छात्राओं के आंदोलन की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट ।

“दशकों गुज़र जाते हैं और कुछ नहीं होता, और कभी कभी महज़ सप्ताहों में कई दशकों की घटनाएं घट जाती हैं|”                    - लेनिन
  

1.बीएचयू में छात्राओं के ऐतिहासिक आंदोलन की शुरुआत:
             21 सितंबर की शाम लाइब्रेरी से हॉस्टल लौट रही एक लड़की(छात्रा) जब BHU में मौजूद भारत कला भवन के पास से गुजर रही थी तो तीन बाइक सवार लड़कों ने उस लड़की के साथ छेड़खानी किया और कपड़ों के अंदर हाथ डाल दिया । लड़की जब चिल्लाई तो लड़कों ने पूछा कि  "रेप करवाओगी या अपने हॉस्टल जाओगी"| वहीं से दस कदम की दूरी पर बैठे सुरक्षाकर्मियों ने भी कोई मदद नहीं की | पीड़ित लड़की जब प्रॉक्टर के पास शिकायत करने पहुंचती है तो उससे पूछा जाता है कि वह 6:00 बजे के बाद हॉस्टल के बाहर क्या कर रही थी।  तुम लोग 6:00 बजे के बाद घूमोगी तो क्यों नहीं होगी छेड़खानी । पीड़िता की शिकायत को न सुनकर उल्टा उसे ही दोषी ठहरा कर  प्रॉक्टर ऑफिस से वापस भेज दिया जाता है । 
     जब पीड़ित छात्रा अपने सुरक्षाकर्मियों के द्वारा इस तरह के व्यवहार करने के बाद हॉस्टल पहुंची और अपने वार्डन से शिकायत किया तो वार्डन ने कह दिया कि "कपड़े में हाथ ही तो डाला है ऐसा क्या हो गया कि इतना परेशान हो" वह छात्रा कुछ समझ नहीं सकी की क्या किया जाए। लेकिन बात धीरे-धीरे दूसरे लड़कियों तक पहुंच गई। तब 21 सितंबर की रात को ही त्रिवेणी गर्ल्स हॉस्टल की सारी लड़कियों ने हॉस्टल के अंदर ही प्रोटेस्ट शुरू कर दिया। पर प्रशासन  और वार्डन ने इस घटना को हर बार की तरह हल्का-फुल्का समझकर रफा-दफा करने की कोशिश की। छोटे-मोटे आश्वासन (जो हर बार की तरह दिया जाता है पर पूरा नहीं किया जाता है) दिया गया । पर इस बार लड़कियों  में इतना गुस्सा था कि उन्होंने रात को ही ऐलान कर दिया था कि सुबह होते ही 6:00 बजे से BHU मुख्यद्वार लंका पर इकट्ठा होकर इस घटना पर अपना प्रतिरोध दर्ज करवाएंगे और BHU प्रशासन से कैंपस में सुरक्षित माहौल देने की मांग करेंगी । 
   22 सितंबर की सुबह 6:00 बजे त्रिवेणी की सारी लड़कियां अपने हॉस्टल से मार्च करते हुए लंका गेट पर आती हैं और वहीं बैठ कर इस आंदोलन की शुरुआत करती हैं । छात्राओं की मांग थी कि उन्हें कैंपस में सुरक्षित माहौल प्रदान किया जाए स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था की जाए लेकिन लड़कियों की यह मांग मानना तो दूर प्रशासन व VC ने लड़कियों से मिलना और उन्हें आश्वस्त करना भी जरूरी नहीं समझा। समय के साथ लड़कियों का कारवां और गुस्सा  बढ़ता गया इससे गर्ल्स हॉस्टल की लड़कियों (MMV, नवीन ,लक्ष्मीबाई व अन्य) भी इस आंदोलन में हजारों की संख्या में आने लगी । 22 की सुबह से 23 सितंबर की रात (जब तक लाठी चार्ज नहीं हुआ ) वह सभी गेट पर बैठकर धरना देती रही। इस आंदोलन में छात्रों की भी काफी अच्छी भागीदारी रही । पूरा आंदोलन छात्र बनाम प्रशासन था । यह आंदोलन कैंपस में वर्षों से छात्राओं के साथ छेड़खानी, भेदभाव व गुलामी की चली आ रही परंपरा के खिलाफ एक खूबसूरत विद्रोह था।

#छात्राओं की निम्नलिखित मांगे जिनको लेकर वे आंदोलित थी |
  •  छेड़खानी के दोषियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही  की जाए।
  •   परिसर के सभी अंधेरे रास्तों और चौराहों पर प्रकाश की उचित व्यवस्था की जाए।
  •  24/7 सुरक्षा गार्डों को परिसर की सुरक्षा के लिए और जिम्मेदार बनाया जाए। 
  •  परिसर के सभी प्रशासनिक कर्मचारियों एवं अध्यापकों में लैंगिक संवेदनशीलता लायी जाए।
  •  सभी छात्राओं के लिए छात्रावास कर्फ्यू टाइमिंग्स हटाई जाए।
  •  महिला छात्रावासों के अधिकारीगण तथा अन्य सहायक कर्मचारी में सामंजस्य को बढ़ावा दिया जाए।
  •  लापरवाह व गैर ज़िम्मेदार सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ जल्द से जल्द उचित करवाई की जाए।
  •  महिला छात्रावास में खाने के व्यंजन एवं सभी आहारों  में समता हो।
  •  GSCASH(Gender Sensitisation Committee against Sexual Harassment ) की स्थापना की जाय। 
  •  महिला सुरक्षा कर्मियों की भर्ती की जाय।
  •  परिसर में प्रत्येक संकाय या संस्थान स्तर पर लैंगिक संवेदनशीलता के  प्रसार के कार्यक्रम अनिवार्य  करना।
  •  परिसर के सभी प्रवेश द्वार में CCTV कैमेरा लगाया जाय।
  •  परिसर में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किया जाय और प्रॉक्टर की जवाबदेहिता तय की जाय।
  •  महिला हेल्पलाइन नम्बर परिसर में मुख्य-मुख्य जगह पर लिखा जाए। 

2. आंदोलन में एबीवीपी की दलाल व गुंडों की भूमिका का पर्दाफाश:         

  इस आंदोलन में एबीवीपी के कुछ नेताओं ने घुसकर आंदोलन को तोड़ने के लिए कई बार समझौता परस्त राजनीति करते हुए VC से संवाद की बात कह कर छात्राओं  को गुमराह करने का प्रयास किया । लेकिन बार-बार vc के नहीं आने पर लड़कियां समझ गई । और उनके सामने ही नारा लगाने लगी "VC के दलालों वापस जाओ तब उन्हें यह श्रेय लेने वाला व्यक्तिवादी बयान देकर आंदोलन से भागना पड़ा  कि "मेरे आंदोलन को दूसरे लोगों ने कब्जा कर लिया"  वह केवल सुरक्षा की ही बात करते रहे। आंदोलन में छात्राओं की आजादी व अधिकार से कोई सरोकार नहीं था । दूसरी कोशिश गुंडों को भेजकर आंदोलनकारियों से झड़प व मारपीट करना। वीसी आवास पर पत्थर चलाना । जिससे आंदोलन को हिंसात्मक करार देकर प्रशासनिक दमन किया जा सके । इसकी तीसरी कोशिश आंदोलन पर फर्जी आरोप लगाकर दुष्प्रचार किया गया कि "मालवीय जी की प्रतिमा पर कालिख पोती  जा रही है । BHU के झंडे को उतारा गया । JNU बनाने की कोशिश की जा रही है आदि” । ताकि आंदोलन का मुद्दा भटक सके। लेकिन छात्रों ने इस दुष्प्रचार का भी धैर्य के साथ बहुत ही रचनात्मक ढंग से जवाब देकर एक एक  का पर्दाफाश कर दिया । इसके बाद तो ये पूरी तरह गुप्तचर का काम करने लगे  । अंततः आंदोलन को तोड़ने के सभी उपाय विफल हो जाने पर बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज करवाया गया। लाठीचार्ज होने के बाद अगले दिन शाम से ABVP कैंपस के अंदर एक धरना देने का नाटक शुरू किया। जो पूरी तरह से प्रशासन प्रायोजित था जिसका  मकसद ABVP की गंदी छवि को साफ करना था। छेड़खानी के खिलाफ 2 दिन से लंका पर बैठी लड़कियों  को डंडे मार कर उठवा दिया गया । वही कैंपस के अंदर प्रशासन एबीवीपी को संरक्षण देकर धरने पर बैठने के ढोंग को बढ़ावा दे रहा था  । ABVP की पूरी कोशिश किसी न किसी तरह वीसी से मिलकर आंदोलन को खत्म  कराकर उसका श्रेय खुद लेना और वीसी की तरफ से पुरस्कार पाना भी था । जैसा कि दूसरे कैंपस से भी हम जानते हैं कि ABVP का चरित्र कैसा है। BHU में चूंकी छात्रसंघ नहीं है । अतः यहां एबीवीपी का मुख्य काम भाजपा और RSS का प्रचार करना और उसके नीतियों को सही ठहराना है। चाहे वे फैसले क्यों न छात्र विरोधी, महिला विरोधी और जनता विरोधी हो। दूसरा मुख्य काम एबीवीपी का BHU VC की दलाली करना है ।  साथ ही साथ प्रशासन और VC के साथ एबीवीपी के पदाधिकारियों का उठना बैठना रहा है । जी सी त्रिपाठी जब से VC बनकर आए हैं  तब से लम्पटों के साथ इनका काफी उठना बैठना रहा है। बीएचयू में जब भी कोई छात्र छात्राओं का लोकतांत्रिक आंदोलन होता है  तो इसे दबाने के लिए बीएचयू प्रशासन और VC कई तरह के हथकंडे अपनाते हैं । उदाहरण स्वरूप लाइब्रेरी आंदोलन के समय आप कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट,छात्र संघ आंदोलन के समय हिंसात्मक मारपीट। इन हिंसा के पीछे आम छात्र ना होकर प्रशासन के द्वारा पाले गए वह लड़के होते हैं जो विश्वविद्यालय के छात्र नहीं होते हैं । यही हुआ छात्राओं के आंदोलन के साथ भी सबसे पहले इसे तोड़ने के लिए एबीवीपी व अन्य गुंडे लड़कों  ने इस आंदोलन को राष्ट्रवाद और महामना के अपमान से जोड़ना चाहा पर यह एजेंडा फेल हो गया। इस तरह हम समझ सकते हैं कि एक तरफ एबीवीपी जो रूढ़िवादी मनुस्मृति का समर्थक और महिलाओं की आजादी के खिलाफ है । वहीं दूसरी तरफ धरने पर बैठ कर पूरे छात्र-छात्राओं के समूह को गुमराह कर रहा है ।  इस दो तरफा राजनीति को  सभी छात्र-छात्राओं को समझकर एबीवीपी का पर्दाफाश करना चाहिए ।

3.RSS व VC की भूमिका:                 
         
   ऐसी घटनाएं सचेत व संगठित तौर पर परिसर में तब से और बढ़ गई हैं जब से BJP की सरकार बनी और  एंटी रोमियो जैसी महिला विरोधी, जातिवादी परियोजनाएं आने लगी। तब से परिसर में VT, मधुवन तथा अन्य जगहों पर कुंठित मानसिकता के बाइक सवार लड़को का झुंड आता है और किसी भी लड़के लड़की को साथ में बैठे देखने पर उनके साथ खुले तौर पर बदतमीजी,छेड़खानी,कमेंट्स, गाली देना व डराना-धमकाना, मारना-पीटना शुरू कर देते हैं । इसके पीछे घोर सामंती और पितृसत्तात्मक सोच रखने वाले   RSS व VC (जीसी त्रिपाठी) का ही हाथ है । तानाशाह वीसी आज तक किसी भी छात्र, कर्मचारी-शिक्षक से मिलना उचित नहीं समझा सिवाय गुंडों दलालों के । पिछले दिनों में भी छात्रों ने 24X7 लाइब्रेरी के लिए आंदोलन किया, छात्राओं ने भी भेदभाव के खिलाफ आंदोलन किया, संविदा कर्मचारियों ने स्थाई करने की मांग को लेकर आंदोलन किया | पर हमारे VC वि.वि. के छात्र-छात्राओं-कर्मचारियों की बाते सुनना तो दूर इसमें संवाद स्थापित करने की भी जहमत नहीं उठाई । इसी रूढ़िवादी सोच जिसका अनुसरण करने वाले RSS तथा अहंकारी सामंती तानाशाह VC की वजह से कैंपस में इतनी बड़ी घटना होती है । और इसी सामंती महिला विरोधी सोच की वजह से वीसी लड़कियों से मिलने नहीं जाता है । घटिया बयान देता है कि "लड़कियां अपनी अस्मिता को बाजार व सड़क पर बेच रही हैं "। यह उसी तरह की पितृसत्तात्मक सोच है कि "बाहर हल्ला मत करो घर में आओ तो बताते हैं तुमको"|  इसी अहंकारी तानाशाही रवैया की वजह से 2 दिन तक लड़कियों से मिलने व उनकी मांगों पर विचार करने के बजाए आंदोलन में सक्रिय नेतृत्वकारी व अन्य लड़कियों को चिन्हित करने व घर पर फोन कर दबाव बनाने तथा ABVP और अपने गुंडों से आंदोलन खत्म करवाने में लगा दिया । अंततः छात्र-छात्राओं पर बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज करवाया गया । इसलिए सभी छात्र-कर्मचारी-शिक्षक परिसर में RSS की विचारधारा व वीसी को ध्वस्त कर अपने लोकतांत्रिक मंच की मांग करें ।

4.कैंपस में आंदोलन की पृष्ठभूमि:                
           
     यह आंदोलन कोई नई घटना नहीं है। इससे पहले भी लगातार वर्षों से  कैम्पस में छिटपुट आंदोलन विभिन्न मांगों को लेकर होते रहे हैं । इससे पहले भी छात्राओं ने छेड़खानी के खिलाफ पूर्व  VC लालजी सिंह के कार्यकाल में आंदोलन किया था । बाद में छात्राओं के साथ सुविधाओं में भेदभाव राजनीतिक गतिविधियों में भाग न लेने के एफिडेविट, 10:00 बजे के बाद फोन नहीं करने देने के खिलाफ आंदोलन चला। इसके अलावा परिसर में ढेर सारे आंदोलन हुए हैं। छात्रसंघ बहाली आंदोलन, कर्मचारी आंदोलन, दलित छात्रों और प्रोफेसरों के साथ भेदभाव का आंदोलन, 24x7 लाइब्रेरी आंदोलन, इसके अलावा विभिन्न मांगों के लिए आंदोलन आदि । छात्र-छात्राओं के मुद्दे और  समस्याओं को बीएचयू प्रशासन व VC द्वारा लगातार अनदेखी करने पर छात्र-छात्राओं का गुस्सा आपे से बाहर हो गया ।  जिसकी परिणीति छात्राओं के आंदोलन के व्यापक रूप में व्यक्त हुआ।

5.आंदोलन को भटकाने के लिए प्रायोजित दुष्प्रचार:                  
     
  बीएचयू कुलपति का पहला बयान आया कि परिसर में राष्ट्रवाद को खत्म नहीं होने देंगे । सबसे बड़े राष्ट्रविरोधी तो हमारे कुलपति ही है । जो अपने सामंती रवैये से महिलाओं के आधे राष्ट्र को गुलाम बनाकर रखना चाहते है और पुरुषों-महिलाओं में भेदभाव करते है । इसलिए यह आंदोलन वास्तव में राष्ट्र को तोड़ने वाले RSS व राष्ट्रविरोधी VC व सामंती प्रशासन के खिलाफ सच्चे राष्ट्रवादी छात्र-छात्राओं का आंदोलन था । जो महिलाओं की सुरक्षा व आजादी की मांग कर  राष्ट्र को मुकम्मल मजबूती प्रदान कर रहे थे । दूसरा BHU को JNU बनाने का आरोप | हम बताना चाहते की यहाँ भी छात्र-छात्राओं की  एक क्रांतिकारी परंपरा राजेंद्र लाहिड़ी से लेकर गोरख पांडे तक की रही है । और यहां के छात्र लगातार पितृसत्ता, सामंतवाद को जमीनी तौर पर जुझारू तरीके से टक्कर दे रहे हैं । सिर्फ लफ्फाजी नहीं करते । इसलिए पंजाब विश्वविद्यालय व BHU का संघर्षशील आंदोलन ही सभी विश्वविद्यालयों के लिए मॉडल है ।  मालवीय जी की प्रतिमा पर कालिख पोतने जैसी सफेद झूठ को तो मीडिया व छात्रों ने तत्काल वहां पहुंचकर पर्दाफाश कर दिया की ऐसी घटना हुई ही नहीं है | यह कहना कि राजनीति हो रही है राजनीति नहीं होनी चाहिए अपने आप में राजनीतिक कथन है। परिसर में छात्राओं के साथ छेड़खानी, उन्हें दोयम दर्जे का समझना, लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या करना एक खास राजनीति के तहत ही वर्षों से किया जा रहा है । वह राजनीति RSS, BJP, कांग्रेस व सभी संसदीय पार्टियों की महिला-दलित-छात्र-अल्पसंख्यक व लोकतंत्र विरोधी राजनीति है । जो पितृसत्ता सामंतवाद पूंजीवाद को संरक्षण देती है । इसलिए छात्र-छात्राओं का संघर्ष भी स्वतः जनवादी राजनीति का ही प्रतिनिधित्व करती है । आंदोलन में हिंसा का भी दुष्प्रचार किया गया | वर्षों से छात्राओं की आधी आबादी को दोयम दर्जे का मानकर व्यापक हिंसा की जाती रही हैं । लोकतांत्रिक तरीके से इसके खिलाफ आवाज उठाने पर बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज किया जाता है । क्या यह हिंसा नहीं है ? जिसे यह व्यवस्था खुद करती और करवाती है | साथ ही साथ इसे न्यायसंगत भी कहता है । इस हिंसा के विरोध में छात्राओं के द्वारा  पत्थर फेंककर किया गया प्रतिरोध हिंसा ही नहीं बल्कि इतिहास में दर्ज सभी विद्रोह, शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ जायज है । जबकि पेट्रोल बम, पत्थर, लाठी, रबर की गोली, आंसू गैस से प्रॉक्टर व पुलिस ने हिंसा की । इसके लिए उन पर सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए । इन सब के चरित्र का पर्दाफाश करने के लिए छात्राएं बधाई की पात्र हैं । अतः प्रशासन को छात्राओं की मांगों पर ही घेरना है जिसका इनके पास कोई जवाब नहीं है ।

6.छात्र-छात्राओं पर बर्बर लाठीचार्ज देश और कैम्पसों में बढ़ रहे फासीवादी हमले की ही एक कड़ी है |

     मात्र तीन दिनों में छात्राओं द्वारा किये गए आंदोलन ने सामंती पितृसत्तात्मक व्यवस्था के हिमायती आरएसएस जैसी शक्तियों को हिला कर रख दिया | यह आंदोलन इतना व्यापक और असरदार था की प्रधानमंत्री मोदी को भी अपने संसदीय क्षेत्र में रास्ता बदलना पड़ा  । |
  इसके बाद कुलपति व प्रशासन तथा उनके पाले गुंडे-चमचे मोदी भक्ति से खाली हुए तो सारा फ्रस्टेशन छात्र-छात्राओं पर बर्बर लाठीचार्ज कर निकाला गया । यही नहीं गोलियां चलाई गयी, पेट्रोल बम फेंके, पत्थर चलाएं,आंसू गैस के गोले दागे गए । इसी तरह के फासीवादी हमलें कोई नई चीज नहीं है। इससे पहले भी पंजाब विश्वविद्यालय में फीस वृद्धि का विरोध कर रहे छात्र-छात्राओं पर लाठी, गोली, आंसू गैस के गोले दागे गए । 60 छात्रों पर गलत तरीके से देशद्रोह का फर्जी मुकदमा लगाया गया । बीएचयू में कार्यरत बीसीएम व एसएफसी द्वारा सहारनपुर मामले को लेकर "योगी गो बैक  का नारा देने पर उन्हें गिरफ्तार कर बर्बर तरीके से पीटा गया । गोरखपुर विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं द्वारा छात्रसंघ की मांग करने पर उन पर लाठी चार्ज करवाया गया तथा चार लड़कियों पर भी जान से मारने के प्रयास का फर्जी मुकदमा लगाया गया। देश में भी चाहे वह गौरी लंकेश की हत्या हो मुस्लिम दलितों को पीट-पीट कर मार देना हो या आदिवासियों पर संगठित सेना द्वारा ऑपरेशन ग्रीन हंट चलाया जाना हो | BHU की यह घटना भी उसी की एक कड़ी मात्र है । लेकिन बीएचयू की छात्राओं ने भी अपने जुझारू संघर्षों से यह बता दिया कि ऐसी फासीवादी शक्तियों को वे चुपचाप सहन नहीं करेंगी बल्कि उनका डटकर मुकाबला करेंगी और अपना अधिकार ले कर रहेंगी |

7.ज्वाइंट एक्शन कमेटी के भ्रम का पर्दाफाश:                       
     पूरे आंदोलन के बाद जॉइंट एक्शन कमेटी का एक भ्रम फैलाया गया कि परिसर में सभी संगठनों का यह साझा मोर्चा है और आंदोलन में इनकी मुख्य  भूमिका है । आंदोलनों को क्रांतिकारी दिशा देने के बजाय अवसरवादी तरीके से ग्लैमराइज करने का प्रयास किया । जिस से छात्रों में निराशा की भी संभावना बन रही थी । इस भ्रम के बारे में कानून की छात्रा अनीता ने स्त्रीकाल वेबसाइट पर अपने लेख में इशारा भी किया था । यह संगठन एनएसयूआई, व अन्य व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा वाले लोगों से मिलकर बना है । इसमें भी BCM,समता SFC व SC ST OBC कमेटी जैसे संगठन नहीं है । यह प्रायोजित तौर पर बीजेपी का विकल्प कांग्रेस घोषित करने जैसा है । विचारधारा व जनता से ऊपर उठे हुए कुछ महत्वाकांक्षी लोग आंदोलन में सक्रिय रहे । आम छात्रों ने इस भ्रम को भी समझने में देर नहीं की ।

8. आंदोलन को व्यापक समर्थन:

       जैसे-जैसे आंदोलन गति पकड़ता गया वैसे-वैसे देशभर के एक्टिविस्टोंऔर बुद्धिजीवियों का समर्थन बढ़ता गया।  आदिवासियों के बीच काम करने वाली सोनी सोरी,असिस्टेंट प्रोफेसर अनुज लुगुन,गाँधीवादी एक्टिविस्ट हिमांशु कुमार आदि का समर्थन मिलने लगा।  बीएचयू के भूतपूर्व प्राध्यापक चौथीराम यादव, बलराज पांडेय समेत शहर के तमाम नागरिक समाज के लोगों ने इस आंदोलन के पक्ष में  सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया। इसके अलावा  देशभर के कैम्पसों के छात्रों ने भी विभिन्न शहरों में समर्थन में प्रदर्शन किये। कहीं-कहीं तो छात्रों ने  कक्षा बहिष्कार कर बीएचयू की छात्राओं के आंदोलन का समर्थन किया । जिसमे मुख्य रुप से इलाहाबाद, गोरखपुर, दिल्ली ,मुंबई ,पंजाब;पटना, भागलपुर  तथा देश के लगभग सभी राज्यों में प्रदर्शन हुए। वूमेन अगेंस्ट स्टेट रिप्रेसन एंड सेक्सुअल वायलेंस(wss),साइंस एंड टेक्नोलॉजी के छात्र संगठनों की संयुक्त समिति(COSTISA),आल इंडिया कमिटी ऑफ स्टूडेंट्स स्ट्रगल (AICSS) तथा अन्य संगठनों ने लाठीचार्ज के विरोध में व आंदोलन के समर्थन में बयान जारी किया | मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल व तमाम सामाजिक कार्यकर्ताओं ने  इस घटना के बाद बीएचयू का दौरा किया और विभिन्न जगहों पर फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट पेश की।

9.बुद्धिजीवियों व शिक्षकों की चुप्पी तथा उनसे छात्र-छात्राओं की अपील:

    एक तरफ तो इस आन्दोलन ने बी.एच.यू. को झकझोर कर रख दिया | जिसका असर देशव्यापी है | लेकिन BHU के शिक्षकों की चुप्पी हैरान करने वाली है| ज्यादातर शिक्षक ना तो समर्थन में रहे ना विरोध में | एक दो लोगों ने ही सही स्टैन्ड लिया तथा समर्थन किया | आन्दोलन के समर्थन में खुलकर सड़कों पर उतरने वालों में मुख्य रूप से चौथीराम यादव,बलिराज पाण्डेय,स्मिता,सुनिल यादव व अन्य शहर के नागरिक सम्मिलित थे | नौकरी कर रहे लोग अपनी लक्ष्मण रेखा को पार नहीं कर सके | जबकि अपने आपको प्रगतिशील बताने में पीछे नही रहते | उनके वक्तव्यों में लोर्का,पाश,ब्रेख्त व नेरुदा की बाते होती है, लेकिन व्यवहार में वही दकियानूस मूल्य होता है | कुछ डाक्टरों ने छात्राओं के आंदोलन के विरोध में प्रायोजित तौर पर मोमबत्ती मार्च निकाला । जिसमें डा० ओपी उपाध्याय खुद छेड़खानी व बलात्कार के आरोप से घिरे हुए है | इसलिए छात्राओं की अपील है कि हमारे शिक्षक व मागदर्शक हमारा समर्थन करें ।

10. विपक्ष की अवसरवादी राजनीति:

         इस आंदोलन का प्रभाव तथाकथित विपक्षी दलों पर भी पड़ा। जो अभी तक सो रहे थे। नोटबन्दी,जीएसटी, किसानों क आत्महत्या ,गोरखपुर में 70 बच्चों की मौत पर विपक्ष को जितना बड़ा आंदोलन खड़ा करना चाहिए था नही किया। स्पष्ट हो जाता है कि इन नीतियों से इनका कोई मतभेद नही है। बीएचयू में हुए आंदोलन को समर्थन देने लगभग  सभी पार्टियां पहुची। सभी के सभी विपक्षी पार्टियां छात्रों की मांगे और लाठीचार्ज के दोषियों पर करवाई की मांग के बजाय दो पार्टियों के बीच संघर्ष खड़ा कर इसको भुनाने में लग गई। इससे साफ पता चलता है कि इनके पास अपना कोई एजेंडा नहीं बचा है। सिवाय अवसरवादी राजनीति के । ये सारी पार्टियां छात्र विरोधी नीतियों का विरोध करेंगी इसकी उम्मीद करना ही मूर्खता होगी । आज बीएचयू की छात्राओं के द्वारा क्रांतिकारी संघर्ष यही दिखता है कि आज मजदूरों-किसानों आदि के साथ साथ छात्र ही असली विपक्ष है । जो इस शोषणकारी व्यवस्था का विकल्प भी देंगे |

11.आंदोलन का प्रभाव:

          इस आंदोलन का प्रभाव इतना व्यापक रहा कि जिला प्रशासन ने पूरे बनारस के सभी विश्वविद्यालय, डिग्री कॉलेज, इंटर कॉलेज को १ हफ्ते के लिए बंद करवा दिया । ताकि इस आंदोलन के समर्थन में कहीं और आंदोलन शुरू न हो । देश के लगभग हर शहर और हर विश्वविद्यालय में आंदोलन के दमन और छात्राओं पर लाठीचार्ज के खिलाफ प्रदर्शन हुए और आज भी हो रहे हैं । इसी आंदोलन के प्रभाव में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रशासन ने एक तात्कालिक मीटिंग बुलाई । जिसमें यह तय किया गया कि  किसी भी छात्रा के साथ छेड़खानी होने पर छेड़खानी करने वाले छात्र पर तुरंत कार्रवाई करते हुए निष्कासित किया जाएगा जांच बाद में होगी। खुद BHU में गर्ल्स हॉस्टल के आसपास लाइट और सीसीटीवी  कैमरे का तत्काल प्रबंध कर दिया गया। सभी सुरक्षाकर्मियों के पुलिस वर्दी को बदलकर गार्ड का ड्रेस उपलब्ध कराया जा रहा है ।
चीफ प्रॉक्टर को बदल कर 100 वर्षों में पहली बार  एक महिला चीफ प्राक्टर को नियुक्त किया गया । एमएचआरडी द्वारा कुलपति को छुट्टी पर भेजना पड़ा। फिर भी अभी ढेर सारी मुख्य मांगे नही मानी गयी है। विभिन्न अखबारों में तथा शिक्षाविदों के बीच यह बहस चल रही है कि एक विश्वविद्यालय के मानक क्या होने चाहिए ?

12.एक आदर्श आंदोलन व छात्राओं की क्रांतिकारी भूमिका:

        यह आंदोलन अपने आप में एक नए तरह का आंदोलन सिद्ध हुआ । क्योंकि जब छात्र के साथ छात्राओं पर भी लाठीचार्ज हुआ तो छात्राओं ने उसका डटकर मुकाबला किया । और SP की गाड़ी को MMV हॉस्टल के आगे नहीं बढ़ने दिया । वे गाड़ी के आगे सड़क पर लेट गईं । वहीं पर सारी लड़कियां पूरी बहादुरी के साथ पुलिस बलों के साथ लोहा ले रही थी । उन पर जब दोबारा लाठीचार्ज हुआ तो वे पत्थर चलाने में भी पीछे नहीं रही । इस आंदोलन ने व्यवस्था के निर्मम चरित्र का पर्दाफाश कर दिया । BHU की लड़कियों के भीतर से डर गायब कर दिया । और उनकी चेतना में यह बात बैठ गई कि  बिना लड़े कुछ नहीं मिलता । बीएचयू के इतिहास में लड़कियों का ये क्रांतिकारी कदम था तथा सभी विश्वविद्यालयों के लिए आदर्श आंदोलन ।

13. दमन व संघर्ष जारी है :

         इस आंदोलन पर बर्बर पुलिसिया दमन के बाद कई हथकंडों से लगातार दमन जारी है | पहले तो हजारों छात्रों पर एफआईआर किया गया | लेकिन छात्र शक्ति के डर से यह फासीवादी निर्णय वापस लेना पड़ा | आंदोलन में सक्रिय होकर सूचना व वैचारिक दिशा देने पर भगत सिंह छात्र मोर्चा के फेसबुक एकाउंट को बंद कर दिया गया | लगातार अपडेट दे रहे  BHU BUZZ  पर एफआईआर किया गया | सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा ट्वीट कर बीएचयू स्टूडेंट्स फॉर चेंज (SFC) को लेफ्ट का पागल संगठन तथा बीएचयू आंदोलन के पीछे इसका हाथ बताया गया | क्राइम ब्रांच की एक कमिटी बनाकर छात्रों को फर्जी मुकदमें की नोटिस भेजी जा रही है | जबकि एक कमिटी ने बीएचयू प्रशासन को दोषी पाया | अभी भी कुलपति को बचाया जा रहा है | बहुत सी बुनियादी मांगे पूरी नहीं की जा रही है | इसलिए छात्र-छात्राएं अभी भी गुस्से में है और विभिन्न तरीकों से संघर्षरत  हैं | इसी कड़ी में भविष्य में फिर बड़े आंदोलन की संभावना है | साथ ही अन्य छात्र विरोधी नीतियों,समस्याओं व कैम्पस लोकतंत्र को लेकर भी आंदोलन की भरपूर संभावना है |

महिलाएं नहीं तो क्रांति नहीं,क्रांति नहीं तो महिला मुक्ति नहीं!
नारी मुक्ति संघर्ष ज़िंदाबाद!
पितृसत्ता को ध्वस्त करो !!
इंकलाब ज़िंदाबाद!!!

Thursday, July 13, 2017

UGC-नेट की परीक्षा साल में दो बार से एक बार करने व सीटों को 15% से घटाकर 6% करने के खिलाफ प्रतिरोध मार्च और सभा।


        आज भगत सिंह छात्र मोर्चा के बैनर तले,बनारस और बी.एच.यू के छात्र-छात्राओ ने Ugc द्वारा जारी किये गये नये नियम और जुलाई की परीक्षा न कराये जाने के खिलाफ सड़क पर उतर कर अपनी प्रतिरोध की आवाज़ बुलन्द की।
मालुम हो की हाल ही में UGC द्वारा जारी नए नियम के अनुसार अब NET की परीक्षा जो साल में  दो बार होती थी अब एक बार होगी और सीटो की संख्या भी 15%+15% से घटा कर 6% होगी।
इस तरह के नए नियम पूरी तरह छात्र विरोधी,शिक्षा विरोधी है। इस नये नियम से यह साफ पता चलता है की सरकार की मनसा छात्रों को पढने देने की है ही नहीं।
पहले भी (एम.फिल) की सीटो में कटौती हो चुकी है। पिछले साल सरकार ने नॉन-नेट फ़ेलोशिप भी बंद करने की कोशिश भी की थी पर छात्र आन्दोलन के दवाब में उसे वापस लेना पड़ा।
हमे पता होना चाहिए की 2015 के दिसम्बर में इस मौजूदा सरकार ने भारत की उच्च शिक्षा को WTO-GATTS के हाथो बेच कर इसे एक कमोडिटी बनाने की कोशिश की है।
ताकि शिक्षा एक खरीद-बिक्री की वस्तु  बन कर रह जाय और यह समाज के पिछड़े,दलित,महिला,शोषितो के पहुच से बाहर हो जाय।
हाल ही में केंद्र सरकार शिक्षा बजट में 55% तक की कटौती कर चुका है। मौजूदा सरकार की ये सब नीतियों से ये साफ़ पता चलता है की सरकार की मनसा शिक्षा अनिवार्यता न होकर कुछ और ही है। आज देश में हर साल 2 करोड़ बेरोजगार पैदा हो रहे है।इस साल की रिपोर्ट से पता चलता है की IT-सेक्टर में भी पिछले साल की तुलना में इस साल नौकरियां कम पैदा हुई है ऊपर से हर रोज़ कई लोगो को अपने नौकरियों से हाथ धोना पड़ रहा है।देश का युवा जो किसी भी राष्ट्र का भविष्य होता है वो आज मारा-मारा फिर रहा है।
अब अगर हम समय रहते इस परिस्थियों को न समझे और इसके खिलाफ एक होकर संघर्ष न करे तो। 

आगे आने वाली हमारी पीढ़िया शिक्षा से वंचित हो जायेगी और देश की हालत और भी ख़राब हो जाएगी।

आज हुई सभा में ये सारी बात रखी गई,जिसमे भगत सिंह छात्र मोर्चा से ज्ञान,मृतुन्जय,विनोद,सिद्धांत,आरती शर्मा, ने 
स्टूडेंट्स फॉर चेंज,IIT से हेमंत ने,
भगत सिंह-आंबेडकर विचार मंच से सुनील यादव ने,यूथ फॉर स्वराज से दिवाक सिंह और कई बी.एच.यू के छात्रों ने अपनी बात रखी।
सभा का संचालन बी सी एम के  विनोद शंकर ने किया।
सभी ने UGC-MHRD द्वारा जारी छात्र विरोधी फैसले को वापस लेने की मांग की। और न वापस लेने पर इस आन्दोलन को तेज और व्यापक करने की बात भी कही। अंत में bcm के सचिव विनोद ने बी.एच.यू,बनारस के सभी छात्र,छात्राओं,बुद्धिजीवियों को इस मानव और शिक्षा विरोधी फैसले के खिलाफ एक साथ आने की अपील की।