Saturday, October 31, 2015

नॉन- नेट फेलोशिप बंद करने और छात्रों पर हुए लाठीचार्ज के विरोध में पुतला दहन व प्रोटेस्ट मार्च !!!

Bhagat Singh Chhatra Morcha along with AISF and SFC Organized today a protest demonstration against UGC's anti-student decision of scrapping non-Net fellowship and police brutality on students of various universities in Delhi...
we strongly opposed UGC policy as it was being guided by the imperio-capitalist forces of which BJP government is merely an outer form...
We strongly condemned police atrocities on students and detention of those struggling democratically for their rights ...
This fascist regime has become critically intolerant of any dissent and this we saw again when police standing-by snatched the effigies of Smriti Irani and Ved Prakash
We students nabbed those effigies back and burnt it with shouting slogans against anti-student policies of this rule commoditizing education and making it slowly an unaffordable thing for vast majority of lower middle class boys and girls
This fascist rule has aroused discontent in various section of our society..be it students..be it intellectuals...writers...artists...and most significantly vast toiling masses
All these discontent should unite and challenge this rule to the fullest
Stop selling education!!
Stop police brutality!!
Students unity long live!!!


यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने एमफिल और पीएचडी करने वाले छात्रों को दी जाने वाली नॉन- नेट फेलोशिप पर रोक लगा दी है। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अगले सत्र से छात्रों को दी जाने वाली नॉन- नेट फेलोशिप बंद कर दी जाएगी। इस तरह लगातार हो रहे छात्रों के साथ अन्याय के विरोध में शाम 3.00 बजे एक प्रोटेस्ट मार्च निकाला जाएगा । जिसमें आप सभी साथियो की उपस्थिति अपेक्षित है। एकत्र होने का स्थान- lanka get,bhu.varanasi.
Orgniser- bhagat singh chhatra morcha (bcm)










Thursday, October 22, 2015

इण्डोनेशिया में 10 लाख कम्युनिस्टों के क़त्लेआम के पचास वर्ष

आज से लगभग 50 वर्ष पूर्व 8 अक्टूबर 1965 को इण्डोनेशिया में वहाँ की सेना द्वारा पीकेआई (इण्डोनेशिया की कम्युनिस्ट पार्टी) के विरुद्ध की गयी सैन्य कार्रवाई में 10 लाख से अधिक कम्युनिस्टों और उनके समर्थकों को क़त्ल कर दिया गया था और 7 लाख से अधिक को जेलों में ठूस दिया गया था। इस नरसंहार को अंजाम देने वाले सैन्य जनरल सुहार्तो ने मार्च 1966 में राष्ट्रपति सुकर्ण का तख़्तापलट किया और सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ले ली।
इण्डोनेशिया में हुए 20वीं सदी के इस जघन्यतम नरसंहार पर कॉरपोरेट मीडिया और विश्व के तमाम पूँजीवादी देशों द्वारा अपनायी गयी चुप्पी पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। ऐसे दस्तावेज़ हैं जिनसे पता चलता है कि यह सब कुछ इण्डोनेशियाई सेना और अमेरिकी साम्राज्यवाद की मिलीभगत से हुआ था।
पीकेआई (इण्डोनेशिया की कम्युनिस्ट पार्टी) की स्थापना 1920 में हुई थी और जल्द ही यह विश्व की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियों की क़तारों में शामिल हो गयी। इण्डोनेशिया के मज़दूरों-किसानों में इसका व्यापक असर था और साम्राज्यवाद के विरुद्ध यह पार्टी सशस्त्र संघर्ष की अगुआई कर चुकी थी। वर्ष 1965 तक इसके 35 लाख सदस्य थे और अगर इसमें मज़दूरों, किसानों, छात्रों-युवाओं, महिलाओं आदि के सम्बद्ध संगठनों की सदस्य संख्या भी जोड़ दी जाये तो यह 3 करोड़ तक पहुँचती थी, उस समय इण्डोनेशिया की कुल आबादी 11 करोड़ थी।

इण्डोनेशिया में उभर रही कम्युनिस्ट ताक़त से अमेरिका काफ़ी बेचैन था। वह पहले ही लाओस, कम्बोडिया और वियतनाम युद्ध में बुरी तरह फँसा हुआ था और वियतनाम के कम्युनिस्ट प्रतिरोध के सामने ख़ुद को विवश महसूस कर रहा था। उधर चीन में कम्युनिस्ट सत्ता मज़बूत हो रही थी और उत्तर कोरिया में भी कम्युनिस्ट सत्ता में आ चुके थे। अमेरिकी खुफ़िया एजेंसी का 1965 में यह मूल्यांकन बन चुका था कि यदि कुछ न किया गया तो दो से तीन वर्षों के भीतर इण्डोनेशिया की सरकार कम्युनिस्टों के हाथों में आ जायेगी। इधर इण्डोनेशिया के भीतर भी वर्ग संघर्ष तीखा हो रहा था। राष्ट्रपति सुकर्ण भूमि सुधारों को ज़मीनी स्तर पर लागू करने में टालमटोल का रवैया अपना रहे थे। कम्युनिस्टों ने 1959 के बटाईदार क़ानून और 1960 के मूल कृषि क़ानून के आधार पर किसानों से अपील की कि वे स्वयं ही क़ानून लागू करने के लिए आगे आयें। इसके परिणामस्वरूप ग्रामीण इलाक़ों में किसानों ने भूमि अधिकार को लेकर लामबन्दियाँ शुरू कर दी।
ग़ौरतलब तथ्य यह है कि सेना के अधिकांश जनरल सामन्ती पृष्ठभूमि से आते थे और कम्युनिस्टों से बेहद घृणा करते थे। वर्ष 1965 में इन जनरलों ने ‘काउंसिल ऑफ़ जनरल्स’ नाम से एक कार्यसमूह का गठन किया और जनरल यानी की अध्यक्षता में हुई बैठक में देश की राजनीतिक स्थिति पर चिन्ता ज़ाहिर की। इन उच्च सैन्य जनरलों को अमेरिका की सरपरस्ती हासिल थी। वे सुकर्ण को अपदस्थ करने और कम्युनिस्टों को ख़त्म करने की योजना बना चुके थे और अब उन्हें केवल सही मौक़े का इन्तज़ार था। जल्द ही इण्डोनेशिया में सरकार का तख़्तापलट किये जाने की अफ़वाहें फैलने लगीं। सेना के निचली पाँतों के अफ़सर जो सुहार्तो के प्रति वफ़ादारी रखते थे भड़कावे की इस कार्रवाई  की चपेट में आ गये और उन्होंने 30 सितम्बर 1965 को कुछ शीर्ष जनरलों को गिरफ्तार कर लिया। इस दौरान हुई मुठभेड़ में एक जनरल मारा गया। सेना जिस मौक़े का इन्तज़ार कर रही थी, उसे वह मौक़ा मिल गया। तख़्तापलट की इस कोशिश का सारा दोष पीकेआई के मत्थे मढ़ दिया गया और जल्द ही पूरे देश में कम्युनिस्टों और उनके समर्थकों के सफाये का भयानक ख़ूनी अभियान शुरू कर दिया गया।
महीनों तक पूरे इण्डोनेशिया में सेना के दस्ते, अपराधियों के गिरोह और जुनूनी प्रचार से भड़काये गये मुस्लिम कट्टरपंथियों के झुण्ड कम्युनिस्टों और उनसे किसी भी तरह की सहानुभूति रखने वालों का बर्बरता से क़त्लेआम करते रहे। औरतों, बच्चों, बूढ़ों किसी को नहीं बख्शा गया। प्रगतिशील विचार रखने वाले शिक्षकों, लेखकों, कलाकारों तक को मौत के घाट उतार दिया गया। लोगों के सिर धड़ से अलग करके बांस पर टाँगकर घुमाये गये। रेडक्रॉस इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार लाशों के कारण महीनों तक कई इलाकों में नदियों का पानी लाल रहा और महामारी फैलने का ख़तरा मंडराता रहा। अब ऐसे दस्तावेज़ सामने आ चुके हैं जिनसे साफ है कि सीआईए ने कम्युनिस्टों और उनके हमदर्दों की सूचियाँ मुहैया करायी थीं। लेकिन इस आधी सदी के दौरान इतिहास के इस बर्बरतम जनसंहार पर पर्दा डालकर रखा गया है।
डिस्कवरी और हिस्ट्री चैनल जैसे साम्राज्यवादी भोंपू जो आये दिन स्तालिन और माओ को हत्यारा और तानाशाह घोषित करते रहते हैं वे कभी इस भयानक घटना का ज़िक्र भी नहीं करते। इण्डोनेशिया की साम्राज्यवाद परस्त हुकूमतों ने आधी सदी तक इस घटना का उल्लेख करने तक को अपराध बना दिया था। इसके बारे में न किसी अखबार में लिखा जा सकता था और न ही इसकी जाँच की माँग की जा सकती थी। लेकिन लाखों कम्युनिस्टों का ख़ून धरती में जज़्ब नहीं रह सकता। इण्डोनेशिया में इतिहास के इस ख़ूनी दौर से पर्दा उठने लगा है, ख़ामोशी टूटने लगी है।


जनसमर्थन और सांगठनिक विस्तार के नज़रिये से देखा जाये तो इण्डोनेशिया की कम्युनिस्ट पार्टी बेहद मज़बूत पार्टी थी लेकिन विचारधारात्मक तौर पर वह पहले ही ख़ुद को नख-दन्तविहीन बना चुकी थी। असल में 1950 के दशक में ही उसने समाजवादी लक्ष्य हासिल करने का शान्तिपूर्ण रास्ता चुना। वर्ष 1965 तक उसने न सिर्फ़ अपने सशस्त्र दस्तों को निशस्त्र किया बल्कि अपना भूमिगत ढाँचा भी समाप्त कर दिया। विचारधारा के स्तर पर वह पूरी तरह सोवियत संशोधनवाद के साथ जाकर खड़ी हो गयी। उसने इण्डोनेशियाई राज्यसत्ता की संशोधनवादी व्याख्या प्रस्तुत की और दावा किया कि यहाँ के राज्य के दो पहलू हैं – एक प्रतिक्रियावादी और दूसरा प्रगतिशील। उन्होंने यहाँ तक कहा कि इण्डोनेशियाई राज्य का प्रगतिशील पहलू ही प्रधान पहलू है। यह बात पूरी तरह ग़लत है और अब तक के क्रान्तिकारी इतिहास के सबक़ों के खि़लाफ़ है। राज्य हमेशा से ही जनता के ऊपर बल प्रयोग का साधन रहा है। शोषकों के हाथों में यह एक ऐसा उपकरण है जिसके ज़रिये वह शोषणकारी व्यवस्थाओं का बचाव करते हैं। पूँजीवाद के अन्तर्गत प्रगतिशील पहलू वाले राज्य की बात करना क्रान्ति के रास्ते को छोड़ने के बराबर है। यह राजनीतिक लाइन पहले भी इतिहास में असफल रही है और एक बार फिर उसे ग़लत साबित होना ही था। लेकिन इस ग़लत राजनीतिक लाइन की क़ीमत थी 10 लाख कम्युनिस्टों की मौत और लाखों को काल कोठरी।
सीपीएम जैसे दोगले कम्युनिस्ट तो इस घटना को भूलकर उसी इंडोनेशियाई कम्पनी के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल में पूँजी निवेश करा रहे थे जिसने इस जनसंहार में मदद की थी। लेकिन सच्चे कम्युनिस्टों को अपने लाखों कम्युनिस्ट भाई-बहनों के क़त्लेआम को कभी भूलना नहीं चाहिए। पूँजीवाद और साम्राज्यवाद को बहे हुए ख़ून के एक-एक क़तरे का हिसाब चुकाना ही होगा।

Tuesday, October 20, 2015

फासीवाद के विरोध में पुरष्कार वापसी मुहीम चला रहे साहित्यकारों-लेखको को सलाम !


साथियो , 
         ऐसी क्या स्थिति आ गयी है कि साहित्यकारों,लेखको,विचारको को सम्मान पुरष्कार वापस करने की मुहीम चलानी पड़ी | तब हम देश की हालत पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि, आज हमारे देश में जो स्थिति बनी हुयी है ऐसा पहले कभी नहीं रहा | हमारे देश का सारा आर्थिक विकास अमेरिका व जापान पर निर्भर  है | ये काम देश के गद्दार दलाल शासक वर्गों द्वारा किया जा रहा है | जिसका प्रतिनिधित्व सभी संसदीय पार्टियां और उनके नेता कर रहे है | अभी इस काम को भाजपा व मोदी सबसे तेजी से कर रहे है | इससे भारत कि स्थिति गुलामी से भी बदतर हो गयी है |  

        जनता की मुलभुत अवस्यकताए रोटी-कपड़ा-मकान को भी छीन जा रहा है | साम्राज्यवादी देशों का हमारे देश पर जैसे-जैसे वर्चस्व बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे महंगाई, बेरोजगारी बढ़ती जा रही है | इसको आप इस उदहारण से समझ सकते है कि दाल और प्याज के दाम क्या है ? इसी तरह जल-जंगल-जमीन जिस पर बहुसंख्यक जनता का जीवन निर्भर है को कार्पोरेट व मल्टिनेसनल कंपनियों के हवाले किया जा रहा है | विकास के नाम पर मध्यम वर्ग को भ्रमित किया जा रहा है ।  जबकि सच्चाई यह है कि रोजगार में लगातार कमी आ रही है | यहाँ तक कि रोजगार सृजन न के बराबर है | जसकी वजह से इहें नाटक करने पड़ रहे है | जैसे वैकेंसी निकालना और रद्द करना, कोर्ट में लटके रहना व संविदा पर काम इत्यादि |

     देश के इस भयंकर संकट पर जनता सचेत न हो,एकजुट न हो,आवाज न उठाये,प्रतिरोध व संघर्ष न करे और दलाल शासको के कृत्यों पर पर्दा पड़ा रहे इसके लिए जाति-मज़हब के नाम पर जनता को बांटने काम किया जा रहा है | साम्प्रदायिकता फैलाई जा रही है | इसमे आरएसएस,भाजपा,बजरंग दल जैसे हिन्दू आतंकवादी व फांसीवादी संगठन शामिल है |

         दादरी में एक मुस्लमान युवक एखलाक को यह कह कर मार दिया जाता है कि इसने गाय का मांस खाया | लेकिन जाँच करने पर पाया गया कि मांस गाय का नहीं था | हरियाणा में मरी हुयी गाय का  खाल निकाल रहे पांच दलितों व मरे हुए पशुओ का शव ले जा रहे दलित ठेकेदार की हत्या कर दी गयी | इस तरह से समाज में उन्माद फैलाया जा रहा है | ताकि मूल मुद्दो से लोगो का ध्यान भटका रहे |

 
        वहीँ अंधश्रद्धा के खिलाफ संघर्ष करने वाले,तर्क के पक्ष में सोचने वाले प्रगतिशील-क्रांतिकारी  विचारों वाले कार्यकर्ता,बुद्धिजीवी व लेखक गंटी प्रसादम,नरेंद्र दाभोलकर,गोविन्द पानसरे,एम एम कालबुर्गी की हिन्दू आतंकवादियों द्वारा निर्मम हत्या कर दी गयी | और लगातार ऐसे सोचने,लिखने,बोलने व संघर्ष करने वालों को धमकियां मिल रही है | यह फासीवाद की चरम अभिव्यक्ति है | जिसका चरित्र ब्राम्हणवादी है | यह एक लोकतान्त्रिक समाज के लिए सबसे खतरनाक है | इससे हर स्तर पर लड़ना पड़ेगा | इसका मुकाबला हम तभी कर पाएंगे जब देश की उत्पीड़ित मेहनतकश जनता (मजदूर, किसान, आदिवासी, दलित,अल्पसंख्यक, छात्र-नौजवान, राष्ट्रीयताये) एकजुट होगी और ब्राम्हणवादी सामंतवाद पर चोट करते हुए साम्राज्यवाद को उखाड़ फेंकेगी | 
       
    इसी कड़ी में साहित्यकारों ने फासीवाद के खतरे व अभिव्यक्ति आज़ादी के खतरे को महसूस किया और प्रतिरोध स्वरुप सम्मान पुरष्कार वापस करने की मुहीम चलाई है जिसको भगत सिंह छात्र मोर्चा छात्रों-विद्यार्थियों की तरफ से सलाम करता है और शिक्षको,बुद्धिजीवियों,लेखकों से आह्वान करता है कि जिस तरह से फासीवादी शासक वर्ग WTO-GATT से समझौता कर हमारी शिक्षा व्यवस्था व विश्वविद्यालयों-कालेजो को साम्राज्यवाद के हवाले कर रहा है | और परिसर में लोकतान्त्रिक स्पेस को ख़त्म कर रहा है | इसके विरोध में अपनी प्रतिरोधी विचारों व कलम की धार को तेज करें ! और देश में फासीवाद के विरुद्ध चल रहे क्रन्तिकारी जन-संघर्षों का समर्थन करें ! 

Saturday, October 17, 2015

हम बोलेंगे, लब खोलेंगे

ब्राह्मणवादी ताकतों द्वारा मुसलमानों और दलितों पर और बोलने की आज़ादी पर किये जा रहे फासीवादी हमलों के खिलाफ आलोचक रविभूषण ने ये कविताएं लिखी हैं
हम बोलेंगे, लब खोलेंगे
यह जोर-जुलुम
गंदी हरकत
यह मार-धाड़, गुंडागर्दी
अक्सर दी जाती जो धमकी
चुप रहने को
चुप नहीं रहेंगे, बोलेंगे
हम बोलेंगे, लब खोलेंगे।

जो कहता है बेशर्मी से
लिखना बंद करो तुम सब
जो लिखने-कहने से हमको
जो बातें करने से हमको
हैं रोक रहे
वे यह जानें, यह समझें भी
हिटलर ही जब नहीं रहा
तो वे फिर कैसे रह लेंगे?
हम बोलेंगे, हां, बोलेंगे.

जो हमें डरानेवाले हैं
जो हमें झुकाने वाले हैं
जो लाज-शरम सब छोड़ चुके
वे यह जानें, यह समझें भी
हम बोलेंगे, लब खोलेंगे.
हम वंशज हैं जिनके देखो
वे कौन रहे हैं, यह देखो
उनकी बानी-मानी देखो
उनका अड़ना-लड़ना देखो
इतिहास पढ़ो, जानो-समझो
उनकी सब कुर्बानी देखो
हम वंशज हैं किनके देखो
वे लड़ते आए हैं, देखो
कलमों की तुम ताकत देखो
अंग्रेजों से बदमाशों से
वे लड़ते आए हैं देखो
उनका भाईचारा देखो
दुश्मन से ललकारा देखो
हम वंशज हैं जिनके देखो

तुम वंशज हो किनके देखो
नाजी-पाजी को भी देखो
जालिम-कातिल को भी देखो
अपनी पैदाइश तो देखो
जो मार-काट के आदी हैं
तुम वंशज हो उनके, देखो
हम बोलेंगे, तुम जुल्मी हो
हम बोलेंगे, तुम झूठे हो
कहते हो कुछ, करते हो कुछ
नकली-असली के भेद सभी
हम खोलेंगे, हां! खोलेंगे
हम बोलेंगे, लब खोलेंगे.

सच कहना अगर बगावत है
तो समझो हम भी बागी हैं
संसद में जो सब बैठे हैं
उनमें अपराधी, दागी हैं.
तुम नहीं कहीं से राष्ट्रभक्त
इतिहासों में तुम नहीं दर्ज
मालूम नहीं है तुम्हें फर्ज
फुसलाते हो, भरमाते हो
गर्जन-तर्जन करते रहते
फिर मौन साध कर रहते हो
हम नहीं रहे हैं कभी मौन
हां बोलेंगे, लब खोलेंगे.

आपस के भाईचारे को
संगी-साथी सब प्यारे को
जो तोड़ रहे, वे यह जानें
हर जोर-जुल्म के टक्कर में
सदियों से हम लड़ते आए
सदियों से हम मरते आए
हम बोलेंगे, लब खोलेंगे.
यह चाल तुम्हारी नहीं चले
यह दाल तुम्हारी नहीं गले
यह दकियानूसी नहीं चले
यह नफरत-फितरत नहीं चले
हम भेद तुम्हारा खोलेंगे
हम बोलेंगे, लब खोलेंगे.

गंदे को गंदा कहने से
झूठे को झूठा कहने से
शातिर को शातिर कहने से
कातिल को कातिल कहने से
हरदम हमको सच कहने से
तुम रोक नहीं सकते हमको
हम बोलेंगे, हां बोलेंगे.

जो हमें लड़ानेवाले हैं
जो हममें, तुममें, उन सबमें
जो मिल कर रहते आए हैं
नफरत फैलानेवाले हैं
वे ये जानें, ये समझें भी
यह सबका वतन है, सबका वतन
सदियों से हम सब एक साथ
रहते आए हैं, यह जानो!
हम नहीं अकेले हैं, जानो!
हम लड़ती फौजें हैं जानो!
हम लाख-करोड़ों हैं, जानो!
हम लाख-करोड़ों एक साथ
कल अपना मुंह जब खोलेंगे
बोलो, फिर तब क्या होगा?
मानो-जानो, समझो-बूझो
हम बोलेंगे, लब खोलेंगे.
हां बोलेंगे, लब खोलेंगे.