Tuesday, February 24, 2015

भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के विरोध में जुलूस एवं सभा :

      अपने छह महीने के कार्यकाल में नरेंद्र मोदी सरकार पूरी तरह से कार्पोरेट घराने की दलाल साबित हुई है |  इसका सबसे बड़ा प्रमाण भूमि अधिग्रहण कानून को अध्यादेश के द्वारा बदल कर पूरी तरह से जनविरोधी बना देना है | यह अध्यादेश कार्पोरेट घरानो को किसानों की जमीन कौड़ियों के भाव दे देने की साजिश के तहत लाया गया है |  





   जिसको लेकर पुरे देश में इस अध्यादेश के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं  | यह कोई पहली बार जल-जंगल-जमीन लूटने की साजिश नहीं है बल्कि आज़ादी के बाद से ही भारतीय राज्य नागालैंड,कश्मीर,झारखंड,छत्तीसगढ़,महाराष्ट्र,आदि राज्यों में जल-जंगल-जमीन को बेतहासा लूटता व लूटवाता  रहा है |    


         इसी क्रम में इस अध्यादेश के विरोध में भगत सिंह छात्र मोर्चा ने बीएचयू के मुख्य द्वार से एक जुलूस निकला और अस्सी घाट पर एक सभा का आयोजन किया | इस जुलूस में सैकड़ों की संख्या में छात्र-बुद्धिजीवी व मजदूर-किसानों ने भाग लिया | जुलूस में लोग "जान देंगे- जमीन नहीं देंगे" ,"जमीन हमारी आपकी- नहीं किसी के बाप की","भूमि अधिग्रहण अध्यादेश वापस लो " सरीखे नारे लगा रहे थे | 



       इसके बाद अस्सी घाट पर हुई सभा में इलाहबाद-मिर्जापुर,सोनभद्र में जल-जंगल-जमीन की लूट के खिलाफ संघर्षरत किसान नेता राजीव चंदेल,राम कैलास कुसवाहा,सुमन अवस्थी,गंभीरा  प्रसाद आदि ने अपनी बात रखी | सभा में अपनी बात रखते हुए वक्ताओं ने कहा कि देशी-विदेशी पूंजीपतियों के हित  में किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करना सरासर अन्याय है | और यह भूमि अधिग्रहण अध्यादेश किसी भी कीमत पर लागू नहीं होने दिया जायेगा | 



       सभा का संचालन वसीम अहमद ने किया | इसमें मशाल सांस्कृतिक मंच कि तरफ से कुछ क्रन्तिकारी गीत भी प्रस्तुत किये गए | इस सभा में मजदूर-किसान एकता मंच,मुसहर बस्ती संघर्ष समिति,रेहड़ी-पटरी गुमटी  व्यवसायी संघर्ष समिति आदि सगठनों ने भी सिरकत किया | 




Saturday, February 21, 2015

बीएचयू से सबंधित कॉलेजो की छात्राओं से बदसुलूकी के विरोध व उनकी मांगों के समर्थन में बीसीएम ने किया प्रदर्शन


      
गत 18 फरवरी 2015 को बीएचयू से से संबंधित कालेज (आर्य महिला पीजी कालेज, वसंता कालेज) की छात्राओं ने बीएचयू के मुख्य द्वार पर अपनी मांगों को लेकर धरना दिया। उनकी मुख्य मांगे थी कि उन्हें भी हेल्थ व लाईब्रेरी कार्ड की सुविधा प्रदान की जाये लेकिन बीएचयू प्रशासन ने उनसे बात करने के बजाय उन पर लाठीचार्ज कर अभद्रता से पेश आई।
इस घटना को लेकर भगत सिंह छात्र मोर्चा ने दिनांक 20 फरवरी 2015 को शाम 5 बजे  बीएचयू के मुख्य द्वार पर प्रदर्शन व सभा की। बीसीएम ने बीएचयू प्रशासन की कड़ी निंदा करते हुए आरोपी गार्डो़ं को निष्कासित करने की मांग की। संगठन ने उनकी मांगों को जायज ठहराते हुए कहा कि छात्रों की मांगे पूरी की जानी चाहिए। 

   
संगठन के सह-सचिव विनोद शंकर ने कहा सभा में अपनी बात रखते हुए कहा कि "जब संबंधित कालेजों के छात्रों का एडमिसन  बीएचयू प्रवेश परीक्षा के जरिये होता है और डिग्री भी बीएचयू की दी जाती है तो सुविधाओं देने में भेदभाव क्यों ? उन्होंने कहा कि छात्राओं के साथ मारपीट व बदसलूकी करना बीएचयू प्रशासन के  सामंती व तानाशाहीपूर्ण रवैये का नतीजा है  जो कि बेहद शर्मनाक है ।" 

इसेक अलावा अध्यक्ष शैलेश कुमार ने भी इस तरह की व्यवस्था पर सवाल उठाया और कहा कि तरह का भेदभाव एक कॉलेज की बात नहीं है बल्कि पूरे देश में ऐसा हो रहा है। नव-उदारवादी नीतियों के तहत शिक्षा से सारी सरकारी सुविधाएं हटाई जा रही है, फीस बढ़ाई जा रही है और इसका निजीकरण किया जा रहा है और यह सब कालेजों के आत्मनिर्भर प्रबंधन के नाम पर किया जा रहा है। जबकि ऐसा पश्चिमी देश कभी नहीं करते हैं । यह केवल साम्राज्यवाद परस्त देश ही कर रहे है और टॉप विश्वविद्यालयो में कोई भी प्राईवेट विश्वविद्यालय नहीं है। इन तथ्यों को देखकर हैं इस पर विचार करने की जरुरत है ।" 

इस क्रम में संदीप, नरेश राम, प्रदीप, आदि ने अपने विचार रखे। सभा का संचालन सिद्धांत ने किया । विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई और जांगायक युद्धेश  के एक गीत के साथ प्रोटेस्ट का  समापन हुआ।  

Sunday, February 15, 2015

साहित्यकार प्रो० तुलसी राम के देहांत पर शोक सभा


दिनांक १४-०२-२०१५ को बीएचयू गेट पर शाम ५ बजे भगत सिंह छात्र मोर्चा और अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति छात्र कार्यक्रम आयोजन समिति ने संयुक्त रूप से श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया | जिसमे बुद्धिजीवियों ने भी भाग लिया | 

बीएचयू गेट से मोमबत्ती लेकर मार्च किया गया | मार्च रविदास गेट होते हुए पुनः बीएचयू गेट पर वापस आकर सभा में बदल गया | सभा में प्रो० प्रमोद कुमार बागडे ने तुलसी राम के चिंतन व साहित्य में उनके योगदान पर अपनी बात रखी | 


इस क्रम में प्रो० अमरनाथ पासवान व संगठन के प्रतिनिधियों ने बात रखी | सभा का सञ्चालन अखिलेश ने किया |इसके आलावा बीसीएम ने पुरे कैंपस में श्रद्धांजलि का पोस्टर लगाया |

Thursday, February 12, 2015

" छात्र मशाल "

" छात्र मशाल " क्रांतिकारी छात्र-नौजवानों की आवाज़..... का चौथा अंक







Wednesday, February 4, 2015

मुसहर बस्ती संघर्ष समिति छित्तूपुर (बीएचयू),वाराणसी ने अपनी मूलभूत अावश्यकताओं के लिए दिया धरना


गत 11 जनवरी 2015 को कड़ाके की ठण्ड में भी अपने मूलभूत अावश्यकताओं से वंचित मुसहरों ने जीवन से तंग आकर डीएम कार्यालय पर धरना दिया. यह बस्ती भारत की तथाकथित नंबर वन रही यूनिवर्सिटी बीएचयू के बगल में है और खास बात यह है कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र भी है. बस्ती के लोगो ने मिलकर अपनी समस्याओं के निदान के लिए मुसहर बस्ती संघर्ष समिति नामक संगठन का निर्माण किया. इसके अध्यक्ष केवल और सचिव सुभाष हैं.

मुसहर बस्ती संघर्ष समिति छित्तूपुर (बीएचयू),वाराणसी ने मांग की है कि डीएम एक बार चल कर उनकी बस्ती का निरीक्षण करें क्योंकि इलाके में ऐसी कई समस्याएं हैं जिसके चलते यहां के लोग आज़ादी के इतने सालों बाद भी अमानवीय परिस्थितियों में रहने के लिए मजबूर हैं. लोकतान्त्रिक देश कि घोषणा होने के बाद जमींदारी उन्मूलन कानून से लेकर ऐसी-एसटी के लिए विशेष तौर पर बनाये गए अन्य कानून भी लागू हुए. इसके बावजूद आज तक उन्हें जमीन का पट्टा  नहीं मिल पाया है. जिस जमीन पर ये लोग 250 सालों से रहते आ रहे हैं आज तक उनको उसका उनको कोई कागज नहीं मिला. ऊपर से आस-पास के कुछ उच्च जाति के दबंग भी उनकी जमीन पर कब्ज़ा करते जा रहे हैं और इन लोगों को इनकी जमीन से बेदखल करने की कोशिश में लगे हैं. छोटी  सी जगह में करीब 200 लोग रहते हैं लेकिन उनके पास रहने के लिए ना कोई घर है, ना पीने के लिए पानी, ना ही शौचालय की व्यवस्था महिलाओं सहित सभी लोगों को शौच के लिए खुले में जाना पड़ता है.

ऐसा नहीं है कि छित्तूपुर ग्राम सभा में उनके नाम पर आवास की योजना ना आयी हो. लेकिन जब भी कोई ऐसी योजना आई तो प्रधान ने दबंगों के प्रभाव में आकर जमीन को विवादित होने का बहाना बनाया या अन्य कोई बहाना बनाकर ये आवास अन्य लोगों को आवंटित कर दिये.
   
इस समिति का कहना था कि जिस जमीन पर वे लोग कई पीढ़ियों से रहते आ रहें हैं उस जमीन का पट्टा उनके नाम कर दिया जाये. इसके अलावा उन्होंने मांग की कि सरकार इंदिरा गांधी आवास योजना या ऐसी अन्य योजनाओं के तहत घर बनवाये तथा साथ ही आने-जाने का रास्ता भी मुहैया कराये.

समिति का कहना है कि आखिर वे भी इस देश के नागरिक हैं और देश के संसाधनों पर उनका भी बराबर का अधिकार है. फिर भी वे लोग जानवरो जैसी जिंदगी जीने को मजबूर क्यों हैं ? मोदी के विकास मॉडल व स्मार्ट सिटी योजना में उनका क्या स्थान होगा ?

डीएम के उरस्थित ना होने के कारण करीब 3.30 बजे सिटी मजिस्ट्रेट ने धरना स्थल पर आकर ज्ञापन लिया. संगठन के पदाधिकारियों व अन्य लोगों ने धरने को सम्बोधित किया और अपनी-अपनी बात रखी. इसके समर्थन के लिए बीएचयू-आईआईटी, बीएचयू के कई छात्रों के साथ-साथ शहर के बुद्धिजीवी भी आये और सबने अपनी बात रखी. जिसमे मुख्य रूप से डा० रमन (विद्यापीठ),प्रो० प्रमोद बागडे (बीएचयू), सामाजिक  कार्यकर्ता पारमिता, प्रवाल,अशोक समदर्शी, शिव प्रसाद (एडवोकेट), विक्रम (पत्रकार), बब्बर, प्रीति, हिमांशु, हेमंत (आईआईटी, बीएचयू), राजेश , सुशील, मनीष , विनोद  (बीएचयू) आदि लोग शामिल हुए.|

मजदूर-किसान नेता कन्हैया ने अपने गीतों से माहौल में गर्मजोशी बनाये रखी. धरने का संचालन सामाजिक कार्यकर्ता व शिक्षक वाशीम अहमद ने किया.

Sunday, February 1, 2015

गुलामी का अध्यादेश है भूमि अधिग्रहण अध्यादेश

                                                                            -  रुपेश कुमार

      नववर्ष 2015 के बधाई स्वरूप 31 दिसंबर को मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनरुद्धार संशोधन कानून 2013 में संशोधन के लिए अध्यादेश जारी किया । 2013 में तत्कालीन कांग्रेसनीत यूपीए सरकार ने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनरुद्धार संशोधन कानून जब बनाया था, तो उस समय भाजपा के भी सभी नेताओं ने सदन में इस कानून के पक्ष में कशीदे गढ़ने में कोई कमी नहीं की थी । दरअसल 2013 में इस कानून के बनने के पीछे देशवासियों के संघर्ष का महत्वपूर्ण योगदान था, हमारे देश में लगातार एक ऐसे भूमि अधिग्रहण कानून को बनाने के लिए विभिन्न जनसंगठनों व राजनीतिक दलों के जरिए भी आंदोलन होता रहता था, इन आंदोलनों के परिणामस्वरूप ही 2013 का कानून बना था । अब सवाल उठता है कि प्रचंड बहुमत ;भाजपा की नजर मेंद्ध से आई मोदी सरकार ने फिर इसमें संशोधन की जरूरत क्यों समझी ? केन्द्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली का कहना है कि ‘‘यूपीए सरकार द्वारा बनाए गए कानून से हम सहमत थे और अभी भी हैं । हमने आधुनिक शहर बनाने के लिए और निवेशकों के लिए, साथ ही साथ गरीबों के खातिर ही कुछ संशोधन किए हैं ।’’
     यह बात अब किसी से छिपी हुई नहीं है कि मोदी ने सत्ता में आने के बाद से ही जितने भी विदेशी दौरे किए या फिर जितने भी विदेशियों को अपने देश में आमंत्रित किया, उन्हें भारत में बेरोकटोक पूंजी निवेश के लिए भी अपने देश की सम्पदाओं का सम्पूर्ण दोहन का भी न्योता दिया । अब सवाल उठता है कि 2013 के कानून में बिना संशोधन किए क्या मोदी अपने विदेशी आकाओं से किया वादा पूरा कर पाते ? इसके लिए 2013 के कानून में हुए संशोधनों के कुछ प्वाइंट को देखना लाजिमी होगा:-
1. 2013 के कानून के सेक्शन 105 में प्रावधान था कि नेशनल हाइवे एक्ट 1956, रेलवे एक्ट 1989, कोल बियरिंग एरियाज एक्विजिशन एंड डेवलपमेंट एक्ट 1957 जैसे 13 कानून भूमि अधिग्रहण कानून के दायरे से बाहर रहेंगे, लेकिन उसमें यह प्रावधान था कि संसद की अनुमति से सरकार इस कानून के लागू होने की तिथि से एक साल बाद ;यानी 1 फरवरी 2015द्ध से इन कानूनों में भी भूमि अधिग्रहण कानून के प्रावधानों को लागू कर सकती है । परिवर्तित कानून में संशोधन कर नए सेक्शन 10ए के तहत औद्योगिक गलियारे, इंफ्रास्ट्रक्चर, रक्षा आदि विशेष श्रेणी की सरकारी और सरकारी व निजी सहभागिता की परियोजनाओं को पूर्ववर्त्ती भूमि अधिग्रहण कानून के दायरे से बाहर कर दिया है ।
2. पूर्ववर्त्ती कानून में सरकारी व निजी क्षेत्र की सहभागिता वाली परियोजनाओं के लिए 70 फीसदी और निजी क्षेत्र की परियोजनाओं के लिए 80 फीसदी जमीन के मालिकों की मंजूरी अनिवार्य थी । नए कानून में इन श्रेणियों में जमीन के मालिकों की मंजूरी की जरूरत नहीं होगी । साथ ही साथ ऐसी परियोजनाओं के लिए बहुफसलीय सींचित जमीन का भी अधिग्रहण किया जा सकता है ।
3. पूर्ववर्त्ती कानून के सेक्शन 101 में प्रावधान था कि अगर अधिग्रहित भूमि 5 वर्षों तक उपयोग में नहीं लायी जाती है, तो वह जमीन के मूल मालिक को वापस कर दी जाएगी । इसमें संशोधन करते हुए 5 वर्ष की जगह, वह समय सीमा जो किसी परियोजना की स्थापना के लिए नियत की गई हो 5 वर्ष, जो भी अधिक हो, कर दिया गया है ।
4. कानून के सेक्शन 24;2द्ध में प्रावधान था कि मुकदमे की स्थिति में स्थगन आदेश 5 वर्ष की समय सीमा में समाहित होगा । इसे सर्वोच्च न्यायलय ने भी स्वीकार किया था । संशोधित अध्यादेश में स्थगन आदेश की अवधि को 5 वर्ष की समय सीमा में नहीं जोड़ा जाएगा ।
5. अध्यादेश में मुआवजे की परिभाषा को बदलते हुए इसमें उस मुआवजे को भी शामिल कर लिया गया है, जो इस उद्येश्य के लिए शुरु किए गए किसी भी खाते में पड़ा हो ।
6. पूर्ववर्त्ती कानून के सेक्शन 87 में प्रावधान था कि किसी केन्द्रीय या राज्य स्तरीय अधिकारी द्वारा कानून के उल्लंघन की स्थिति में संबंधित विभाग के प्रमुख को भी जिम्मेवार माना जाएगा । इस अध्यादेश में इस व्यवस्थ को संशोधित करते हुए प्रावधान किया गया है कि न्यायलय प्रोसिज्यूर कोड के सेक्शन 197 के तहत ही कार्रवाही कर सकती है ।
7. पूर्ववर्त्ती कानून में प्रावधानों को लागू करने की समय सीमा दो वर्ष निर्धारित की गई थी, लेकिन अध्यादेश में इसे बढ़ाकर 5 वर्ष कर दिया गया है ।
8. अधिग्रहण से ‘प्रभावित परिवारों’ की परिभाषा में बदलाव स्पष्ट नहीं है ।
9. संशोधित अध्यादेश के रेट्रोस्पेक्टिव प्रावधान के अनुसार पहले से अधिग्रहित भूमि का अधिग्रहण रद्द किया जा सकता है, जिनमें मुआवजे नहीं दिए गए हैं या जमीन का कब्जा नहीं लिया गया है ।
10. मुआवजे के निर्धारण व बंटवारे में न्यायलय की निगरानी के प्रावधाव को बदल दिया गया है, अब यह जरूरी नहीं होगा ।
    इन सभी बदलाओं के गहन विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस अध्यादेश का स्वरूप 1894 में ब्रिटिश शासन द्वारा लाए गए औपनिवेशिक भूमि अधिग्रहण के समान ही है । समुचित मुआवजे का अधिकार एवं भूमि अधिग्रहण में पारदर्शिता तथा पुनर्वास कानून में बड़ा बदलाव कर मोदी सरकार ने फिर से एकबार औपनिवेशिक शासन की याद दिला दी है । इस अध्यादेश को ‘‘गुलामी का अध्यादेश’’ ही कहा जा सकता है । इस अध्यादेश के रूप में जिस तरह से किसी को भी किसी भी समय मनमाने तरीके से उनके घर से निकाला जा सकता है और वो भी कानून की शक्ल में । इससे बड़ा दुर्भाग्य इस तथाकथित लोकतांत्रिक देश के लिए और क्या होगा ? छद्म लोकतंत्र का आवरण टूट रहा है और इसे तोड़नेवाला ही अपने को दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का प्रधानमंत्री कहता है ।
आज पूरे देश के लोकतंत्रपसंद लोग सड़क पर उतरकर इस अध्यादेश का विरोध कर रहे हैं, लेकिन ‘‘आदिवासियों व किसानों की जमीन नहीं छीनने देंगे’’ का नारा देकर चुनाव जीतने वाली पार्टी के कानों पर जूं भी नहीे रेंग रही है । देश देशी-विदेशी पूंजीपतियों के चंगुल में पूरी तरह से फंसते जा रहा है । अगर हम अब भी कुम्भकर्णी निद्रा में सोए रहेंगे, तो हमारे देश का भविष्य क्या होगा ? ये सोचने की बात है । आज वक्त की जरूरत है कि ऐसे गुलामी के अध्यादेश को फाड़कर आग के हवाले कर दें और उस आग की लपटों से ऐसे अध्यादेश पारित करने वाली सरकार के सिंहासन को भी जला दें ।