Friday, July 4, 2014

बसपा का शीराजा क्यों बिखरा: आनंद तेलतुंबड़े




आनंद तेलतुंबड़े ने अपने इस लेख में बसपा की पराजय का आकलन करते हुए एक तरफ मौजूदा व्यवस्था के जनविरोधी चेहरे और दूसरी तरफ उत्पीड़ित जनता के लिए पहचान की राजनीति के खतरों के बारे में बात की है. अनुवाद: रेयाज उल हक

पिछले आम चुनाव हैरानी से भरे हुए रहे, हालांकि पहले से यह अंदाजा लगाया गया था कि कांग्रेस के नतृत्व वाला संप्रग हारेगा और भाजपा के नेतृत्व वाला राजग सत्ता में आने वाला है. वैसे तो चुनावों से पहले और बाद के सभी सर्वेक्षणों ने भी इसी से मिलते जुलते राष्ट्रीय मिजाज की पुष्टि की थी, तब भी नतीजे आने के पहले तक भाजपा द्वारा इतने आराम से 272 का जादुई आंकड़ा पार करने और संप्रग की सीटें 300 के पार चली जाने की अपेक्षा बहुत कम लोगों ने ही की होगी. खैर, भाजपा ने 282 सीटें हासिल कीं और संप्रग को 336 सीटें. महाराष्ट्र में शरद पवार, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह, बिहार में नीतीश कुमार जैसे अनेक क्षेत्रीय क्षत्रप मुंह के बल गिरे. लेकिन अब तक चुनाव नतीजों का सबसे बड़ा धक्का यह रहा कि बहुजन समाज पार्टी का उत्तर प्रदेश की अपनी जमीन पर ही पूरी तरह सफाया हो गया. लोग तो यह कल्पना कर रहे थे, और बसपा के नेता इस पर यकीन भी कर रहे थे, कि अगर संप्रग 272 सीटें हासिल करने नाकाम रहा तो इसके नतीजे में पैदा होने वाली राजनीतिक उथल-पुथल में मायावती हैरानी में डालते हुए देश की प्रधानमंत्री तक बन सकती हैं. इस कल्पना को मद्देनजर रखें तो बसपा का सफाया स्तब्ध कर देने वाला है. आखिर हुआ क्या?

नतीजे आने के बाद एक संवाददाता सम्मेलन में मायावती ने दावा किया कि दलितों और निचली जातियों में उनका जनाधार बरकरार है और चुनावों में खराब प्रदर्शन की वजह भाजपा द्वारा किया गया सांप्रदायिक ध्रुवीकरण है. उन्होंने कहा कि जबकि ऊंची जातियों और पिछड़ी जातियों को भाजपा ने अपनी तरफ खींच लिया और मुसलमान समाजवादी पार्टी की वजह से बिखर गए. बहरहाल उन्होंने इसके बारे में कोई व्याख्या नहीं दी कि ये चुनावी खेल अनुचित कैसे थे. मतों के प्रतिशत के लिहाज से यह सच है कि बसपा उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है. राष्ट्रीय स्तर पर इसे 2.29 करोड़ वोट मिले जो कुल मतों का 4.1 फीसदी है. 31.0 फीसदी मतों के साथ भाजपा और 19.3 फीसदी मतों के साथ इससे आगे हैं और 3.8 फीसदी मतों के साथ सापेक्षिक रूप से एक नई पार्टी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस इससे पीछे है. 15वीं लोकसभा में बसपा की 21 सीटें थीं जिनमें से 20 अकेले उत्तर प्रदेश से थीं. बसपा से कम मत प्रतिशत वाली अनेक पार्टियों ने इससे कहीं ज्यादा सीटें जीती हैं. मिसाल के लिए तृणमूल कांग्रेस को मिले 3.8 फीसदी मतों ने उसे 34 सीटें दिलाई हैं और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम को इससे भी कम 3.3 फीसदी मतों पर तृणमूल से भी ज्यादा, 37 सीटें मिली हैं. यहां तक कि आम आदमी पार्टी (आप) महज 2.0 फीसदी मतों के साथ चार सीटें जीतने में कामयाब रही. उत्तर प्रदेश में बसपा को 19.6 फीसदी मत मिले हैं जो भाजपा के 42.3 फीसदी और सपा के 22.2 फीसदी के बाद तीसरी सबसे बड़ी हिस्सेदारी है. इसमें भी एक खास बात है: चुनाव आयोग के आंकड़े दिखाते हैं कि बसपा इस विशाल राज्य की 80 सीटों में 33 पर दूसरे स्थान पर रही.

लेकिन देश में तीसरी सबसे ज्यादा वोट पाने वाली पार्टी का संसद में कोई वजूद नहीं होने की सबसे बड़ी वजह हमारी चुनावी व्यवस्था है, जिसके बारे में बसपा कभी भी कोई शिकायत नहीं करेगी. सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित करने वाली यह चुनावी व्यवस्था (एफपीटीपी) हमें हमेशा ही हैरान करती रही है, इस बार इसने कुछ ज्यादा ही हैरान किया. भाजपा कुल डाले गए वोटों में से महज 31.0 फीसदी के साथ कुल सीटों का 52 फीसदी यानी 282 सीटें जीत सकी. चुनाव आयोग के आंकड़े के मुताबिक कुल 66.36 फीसदी वोट डाले गए, इसका मतलब है कि भाजपा को जितने वोट मिले उनमें कुल मतदाताओं के महज पांचवें हिस्से (20.5 फीसदी) ने भाजपा को वोट दिया. इसके बावजूद भाजपा का आधी से ज्यादा सीटों पर कब्जा है. इसके उलट, हालांकि बसपा तीसरे स्थान पर आई लेकिन उसके पास एक भी सीट नहीं है. जैसा कि मैं हमेशा से कहता आया हूं, एफपीटीपी को चुनने के पीछे हमारे देश के शासक वर्ग की बहुत सोची समझी साजिश रही है. तबके ब्रिटिश साम्राज्य के ज्यादातर उपनिवेशों ने इसी चुनाव व्यवस्था को अपनाया. लेकिन एक ऐसे देश में जो निराशाजनक तरीके से जातियों, समुदायों, नस्लों, भाषाओं, इलाकों और धर्मों वगैरह में ऊपर से नीचे तक ऊंच-नीच के क्रम के साथ बंटा हुआ है, राजनीति में दबदबे को किसी दूसरी चुनावी पद्धति के जरिए यकीनी नहीं बनाया जा सकता था. एफपीटीपी हमेशा इस दबदबे को बनाए रखने में धांधली की गुंजाइश लेकर आती है. इस बात के व्यावहारिक नतीजे के रूप में राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस या भाजपा का दबदबा इसका सबूत है. अगर मिसाल के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व (पीआर) व्यवस्था अपनाई गई होती, जो प्रातिनिधिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं द्वारा चुनावों के लिए अपनाई गई अधिक लोकप्रिय और अधिक कारगर व्यवस्था है, तो सभी छोटे समूहों को अपना ‘स्वतंत्र’ प्रतिनिधित्व मिला होता जो इस दबदबे के लिए हमेशा एक खतरा बना रहता. दलितों के संदर्भ में, इसने आरक्षण कहे जाने वाले सामाजिक न्याय के बहुप्रशंसित औजार की जरूरत को भी खत्म कर दिया होता, जिसने सिर्फ उनके अस्तित्व के अपमानजनक मुहावरे का ही काम किया है. कोई भी दलित पार्टी एफपीटीपी व्यवस्था के खिलाफ आवाज नहीं उठाएगी. बसपा तो और भी नहीं. क्योंकि यह उन सबके नेताओं को अपने फायदे के लिए धांधली करने में उसी तरह सक्षम बनाती है, जैसा यह शासक वर्गीय पार्टियों को बनाती आई है.

दूसरी वजह पहचान की राजनीति का संकट है, जिसने इस बार पहचान की राजनीति करने वाली बसपा से इसकी एक भारी कीमत वसूली है. बसपा की पूरी कामयाबी उत्तर प्रदेश में दलितों की अनोखी जनसांख्यिकीय उपस्थिति पर निर्भर रही है, जिसमें एक अकेली दलित जाति जाटव-चमार कुल दलित आबादी का 57 फीसदी है. इसके बाद पासी दलित जाति का नंबर आता है, जिसकी आबादी 16 फीसदी है. यह दूसरे राज्यों के उलट है, जहां पहली दो या तीन दलित जातियों की आबादी के बीच इतना भारी फर्क नहीं होता है. इससे वे प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं, जिनमें से एक आंबेडकर के साथ खुद को जोड़ता है तो दूसरा जगजीवन राम या किसी और के साथ. लेकिन उत्तर प्रदेश में जाटवों और पासियों के बीच में इतने बड़े फर्क के साथ इस तरह की कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं है और वे एक साझे जातीय हित के साथ राजनीतिक रूप से एकजुट हो सकते हैं. इसके बाद की तीन दलित जातियों – धोबी, कोरी और वाल्मीकि – को भी उनके साथ मिला दें तो वे कुल दलित आबादी का 87.5 फीसदी बनते हैं, जो राज्य की कुल आबादी की 18.9 फीसदी आबादी है. कुल मतदाताओं में भी इन पांचों जातियों का मिला जुला प्रतिशत भी इसी के आसपास होगा. यह बसपा का मुख्य जनाधार है. इन चुनावी नतीजों में कुल वोटों में बसपा का 19.6 फीसदी वोट हासिल करना दिखाता है कि बसपा का मुख्य जनाधार कमोबेश बरकरार रहा होगा.

दूसरे राज्यों के दलितों के उलट जाटव-चमार बाबासाहेब आंबेडकर के दिनों से ही आर्थिक रूप से अच्छे और राजनीतिक रूप से अधिक संगठित रहे हैं. 1957 में आरपीआई के गठन के बाद, आरपीआई के पास महाराष्ट्र के बाद उत्तर प्रदेश में सबसे मजबूत इलाके रहे हैं, कई बार तो महाराष्ट्र से भी ज्यादा. यह स्थिति आरपीआई के टूटने तक रही. महाराष्ट्र में आरपीआई के नेताओं की गलत कारगुजारियों के नक्शेकदम पर चलते हुए उत्तर प्रदेश में आरपीआई के दिग्गजों बुद्ध प्रिय मौर्य और संघ प्रिय गौतम भी क्रमश: कांग्रेस और भाजपा के साथ गए. इस तरह जब कांशीराम ने उत्तर प्रदेश में कदम रखे तो एक दशक या उससे भी अधिक समय से वहां नेतृत्व का अभाव था. उनकी रणनीतिक सूझ बूझ ने उनकी बहुजन राजनीति की संभावनाओं को फौरन भांप लिया. उन्होंने और मायावती ने दलितों को फिर से एकजुट करने और पिछड़ों और मुसलमानों के गरीब तबकों को आकर्षित करने के लिए भारी मेहनत की. जब वे असल में अपनी इस रणनीति की कामयाबी को दिखा पाए, तो उन्होंने पहले से अच्छी तरह स्थापित दलों को एक कड़ी टक्कर दी और उसके बाद सीटें जीतने में कामयाब रहे. इससे राजनीतिक रूप से अब तक किनारे पर रहे सामाजिक समूह भी बसपा के जुलूस में शामिल हो गए. मायावती ने यहां से शुरुआत की और उस खेल को उन्होंने समझदारी के साथ खेला, जो उनके अनुभवी सलाहकार ने उन्हें सिखाया था. जब वे भाजपा के समर्थन के साथ मुख्यमंत्री बनीं, तो इससे बसपा और अधिक मजबूत हुई. ताकत के इस रुतबे पर मायावतीं अपने फायदे के लिए दूसरे राजनीतिक दलों के साथ बातचीत करने लगीं.

कुछ समझदार दलित बुद्धिजीवियों ने इस पर अफसोस जाहिर किया है कि बसपा ने दलितों के उत्थान के लिए कुछ नहीं किया है. लेकिन इस मामले की असल बात यह है कि इस खेल का तर्क बसपा को ऐसा करने की इजाजत नहीं देता है. जैसे कि शासक वर्गीय दलों के लिए यह बेहद जरूरी है कि वे जनसमुदाय को पिछड़ेपन और गरीबी में बनाए रखें, मायावती ने यही तरीका अख्तियार करते हुए उत्तर प्रदेश में दलितों को असुरक्षित स्थिति में बनाए रखा. वे भव्य स्मारक बना सकती थीं, दलित नायकों की प्रतिमाएं लगवा सकती थीं, चीजों के नाम उन नायकों के नाम पर रख सकती थीं और दलितों में अपनी पहचान पर गर्व करने का जहर भर सकती थीं लेकिन वे उनकी भौतिक हालत को बेहतर नहीं बना सकती थीं वरना ऐसे कदम से पैदा होने वाले अंतर्विरोध जाति की सोची-समझी बुनियाद को तहस नहस कर सकते थे. स्मारक वगैरह बसपा की जीत में योगदान करते रहे औऱ इस तरह उनकी घटक जातियों तथा समुदायों द्वारा हिचक के साथ वे कबूल कर लिए गए. लेकिन भेद पैदा करने वाला भौतिक लाभ समाज में ऐसी न पाटी जा सकने वाली खाई पैदा करता, जिसे राजनीतिक रूप से काबू में नहीं किया सकता. इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि एक दलित या गरीब परस्त एजेंडा नहीं बनाया जा सकता था. राजनीतिक सीमाओं के बावजूद वे दिखा सकती थीं कि एक ‘दलित की बेटी’ गरीब जनता के लिए क्या कर सकती है. लेकिन उन्होंने न केवल अवसरों को गंवाया बल्कि उन्होंने लोगों के भरोसे और समर्थन का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया.

बाद में उनकी बढ़ी हुई महत्वाकांक्षाएं उन्हें बहुजन से सर्वजन तक ले गईं, जिसमें उन्होंने अपना रुख पलटते दिया और उनमें दलितों के लिए जो भी थोड़ा बहुत सरोकार बचा था, उसे और खत्म कर दिया. तब अनेक विश्लेषकों ने यह अंदाजा लगाया था कि दलित मतदाता बसपा से अलग हो जाएंगे, लेकिन दलित उन्हें हैरानी में डालते हुए मायावती के साथ पहले के मुकाबले अधिक मजबूती से खड़े हुए और उन्हें 2007 की अभूतपूर्व सफलता दिलाई. इसने केवल दलितों की असुरक्षा को ही उजागर किया. वे बसपा से दूर नहीं जा सकते, भले ही इसकी मुखिया चाहे जो कहें या करें, क्योंकि उन्हें डर था कि बसपा के सुरक्षात्मक कवच के बगैर उन्हें गांवों में सपा समर्थकों के हमले का सामना करना पड़ेगा. अगर मायावती इस पर गर्व करती हैं कि उनके दलित मतदाता अभी भी उनके प्रति आस्थावान हैं तो इसका श्रेय मायावती को ही जाता है कि उन्हें दलितों को इतना असुरक्षित बना दिया है कि वे इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं अपना सकते. निश्चित रूप से इस बार भाजपा ने कुछ दलित जातियों को लुभाया है और वे संभवत: गोंड, धानुक, खटिक, रावत, बहेलिया, खरवार, कोल आदि हाशिए की जातियां होंगी जो दलित आबादी का 9.5 फीसदी हिस्सा हैं. मुसलमान भी ऐसे ही एक और असुरक्षित समुदाय हैं जिन्हें हमेशा अपने बचाव कवच के बारे में सोचना पड़ता है. इस बार बढ़ रही मोदी लहर और घटती हुई बसपा की संभावनाओं को देखते हुए वे सपा के इर्द-गिर्द जमा हुए थे उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा. 2007 के चुनावों में उत्तर प्रदेश की सियासी दुनिया में फिर से दावेदारी जताने को बेकरार ब्राह्मणों समेत ये सभी जातियां बसपा की पीठ पर सवार हुईं और उन्होंने बसपा को एक भारी जीत दिलाई थी, लेकिन बसपा उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी. तब वे उससे दूर जाने लगे जिसका नतीजा दो बरसों के भीतर, 2009 के आम चुनावों में दिखा जब बसपा की कुल वोटों में हिस्सेदारी 2007 के 30.46 फीसदी से गिरकर 2009 में 27.42 फीसदी रह गई. इस तरह 3.02 फीसदी वोटों का उसे नुकसान उठाना पड़ा. तीन बरसों में यह नुकसान 1.52 फीसदी और बढ़ा और 2012 के विधानसभा चुनावों में कुल वोटों की हिस्सेदारी गिरकर 25.90 पर आ गई. और अब 2014 में यह 19.60 फीसदी रह गई है जो कि 6.30 फीसदी की गिरावट है. यह साफ साफ दिखाता है कि दूसरी जातियां और अल्पसंख्यक तेजी से बसपा का साथ छोड़ रहे हैं और यह आने वाले दिनों की सूचना दे रहा है जब धीरे धीरे दलित भी उन्हीं के नक्शेकदम पर चलेंगे. असल में मायावती की आंखें इसी बात से खुल जानी चाहिए कि उनका राष्ट्रीय वोट प्रतिशत 2009 के 6.17 से गिर कर इस बार सिर्फ 4.1 फीसदी रह गया है.

जबकि जाटव-चमार वोट उनके साथ बने हुए दिख रहे हैं, तो यह सवाल पैदा होता है कि वे कब तक उनके साथ बने रहेंगे. मायावती उनकी असुरक्षा को बेधड़क इस्तेमाल कर रही हैं. न केवल वे बसपा के टिकट ऊंची बोली लगाने वालों को बेचती रही हैं, बल्कि उन्होंने एक ऐसा अहंकार भी विकसित कर लिया है कि वे दलित वोटों को किसी को भी हस्तांतरित कर सकती हैं. उन्होंने आंबेडकरी आंदोलन की विरासत को छोड़ कर 2002 के बाद के चुनावों में मोदी के लिए प्रचार किया जब पूरी दुनिया मुसलमानों के जनसंहार के लिए उन्हें गुनहगार ठहरा रही थी. उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु कांशीराम के ‘तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ जैसे नारों को भी छोड़ दिया और मौकापरस्त तरीके से ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है’ जैसे नारे चलाए. लोगों को कुछ समय के लिए पहचान का जहर पिलाया जा सकता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे बेवकूफ हैं. लोगों को मायावती की खोखली राजनीति का अहसास होने लगा है और वे धीरे धीरे बसपा से दूर जाने लगे हैं. उन्होंने मायावती को चार बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया लेकिन उन्होंने जनता को सिर्फ पिछड़ा बनाए रखने का काम किया और अपने शासनकालों में उन्हें और असुरक्षित बना कर रख दिया. उत्तर प्रदेश के दलित विकास के मानकों पर दूसरे राज्यों के दलितों से कहीं अधिक पिछड़े बने हुए हैं, बस बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश और राजस्थान के दलित ही उनसे ज्यादा पिछड़े हैं. मायावती ने भ्रष्टाचार और पतनशील सामंती संस्कृति को बढ़ाना देने में नए मुकाम हासिल किए हैं, जो कि बाबासाहेब आंबेडकर की राजनीति के उल्टा है जिनके नाम पर उन्होंने अपना पूरा कारोबार खड़ा किया है. उत्तर प्रदेश दलितों पर उत्पीड़न के मामले में नंबर एक राज्य बना हुआ है. यह मायावती ही थीं, जिनमें यह बेहद गैर कानूनी निर्देश जारी करने का अविवेक था कि बिना जिलाधिकारी की इजाजत के दलितों पर उत्पीड़न का कोई भी मामला उत्पीड़न अधिनियम के तहत दर्ज नहीं किया जाए. ऐसा करने वाली वे पहली मुख्यमंत्री थीं.

जातीय राजनीति की कामयाबी ने बसपा को इस कदर अंधा कर दिया था कि वह समाज में हो रहे भारी बदलावों को महसूस नहीं कर पाई. नई पीढ़ी उस संकट की आग को महसूस कर ही है जिसे नवउदारवादी आर्थिक नीतियों ने उनके लिए पैदा की हैं. देश में बिना रोजगार पैदा किए वृद्धि हो रही है, और सेवा क्षेत्र में जो भी थोड़े बहुत रोजगार पैदा हो रहा है उन्हें बहुत कम वेतन वाले अनौपचारिक क्षेत्र में धकेल दिया जा रहा है. सार्वजनिक और सरकारी क्षेत्रों के सिकुड़ने से आरक्षण दिनों दिन अप्रासंगिक होते जा रहे हैं. दूसरी तरफ सूचनाओं में तेजी से हो रहे इजाफे के कारण नई पीढ़ी की उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं. उन्हें जातिगत भेदभाव की वैसी आग नहीं झेलनी पड़ी है जैसी उनके मां-बाप ने झेली थी. इसलिए वे ऊंची जातियों के बारे में पेश की जाने वाली बुरी छवि को अपने अनुभवों के साथ जोड़ पाने में नाकाम रहते हैं. उनमें से अनेक बिना दिक्कत के ऊंची जातियों के अपने दोस्तों के साथ घुलमिल रहे हैं. हालांकि वे अपने समाज से रिश्ता नहीं तोड़ेंगे लेकिन जब कोई विकास के बारे में बात करेगा तो यह उन्हें अपनी तरफ खींचेगा. और यह खिंचाव पहचान संबंधी उन बातों से कहीं ज्यादा असरदार होगा जिसे वे सुनते आए हैं. दलित नौजवान उदारवादी संस्कृति से बचे नहीं रह सकते हैं, बल्कि उन्हें व्यक्तिवाद, उपभोक्तावाद, उपयोगवाद वगैरह उन पर असर डाल रहे हैं, इनकी गति हो सकता है कि धीमी हो. यहां तक कि गांवों में भीतर ही भीतर आए बदलावों ने निर्वाचन क्षेत्रों की जटिलता को बदल दिया है, जिसे हालिया अभियानों में भाजपा ने बड़ी महारत से इस्तेमाल किया जबकि बसपा और सपा अपनी पुरानी शैली की जातीय और सामुदायिक लफ्फाजी में फंसे रहे. बसपा का उत्तर प्रदेश के नौजवान दलित मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाना साफ साफ दिखाता है कि दलित वोटों में 1.61 करोड़ के कुल इजाफे में से केवल 9 लाख ने ही बसपा को वोट दिया.

भाजपा और आरएसएस ने मिल कर दलित और पिछड़ी जातियों के वोटों को हथियाने की जो आक्रामक रणनीति अपनाई, उसका असर भी बसपा के प्रदर्शन पर दिखा है. उत्तर प्रदेश में भाजपा के अभियान के संयोजक अमित शाह ने आरएसएस के कैडरों के साथ मिल कर विभिन्न जातीय नेताओं और संघों के साथ व्यापक बातचीत की कवायद की. शाह ने मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हमले का इस्तेमाल पिछड़ी जातियों को अपने पक्ष में लुभाने के लिए किया. उसने मोदी की जाति का इस्तेमाल ओबीसी वोटों को उत्साहित करने के लिए किया कि उनमें से ही एक इंसान भारत का प्रधानमंत्री बनने जा रहा है. इस रणनीति ने उन इलाकों की पिछड़ी जातियों में सपा की अपील को कमजोर किया, जो सपा का गढ़ मानी जाती थीं. इस रणनीति का एक हिस्सा बसपा के दलित आधार में से गैर-जाटव जातियों को अलग करना भी था. भाजपा ने जिस तरह से विकास पर जोर दिया और अपनी सुनियोजित प्रचार रणनीति के तहत बसपा की मौकापरस्त जातीय राजनीति को उजागर किया, उसने भी बसपा की हार में एक असरदार भूमिका अदा की. लेकिन किसी भी चीज से ज्यादा, बसपा की अपनी कारगुजारियां ही इसकी बदतरी की जिम्मेदार हैं. यह उम्मीद की जा सकती है कि इससे पहले कि बहुत देर हो जाए बसपा आत्मविश्लेषण करेगी और खुद में सुधार करेगी.

सृष्टि पर पहरे के खिलाफ बज रही हैं घंटियां: केदारनाथ और अशोक वाजपेयी की कविता



 रंजीत वर्मा के इस आलेख में अशोक वाजपेयी और केदारनाथ सिंह के नए कविता संग्रहों की विवेचना की गई है. समयांतर से साभार .

हिंदी कविता की जो वरिष्ठतम पीढ़ी आज हमारे बीच सृजनरत हैं केदारनाथ सिंह और अशोक वाजपेयी वहीं से आते हैं। सृष्टि पर पहरा (केदारनाथ सिंह) और कहीं कोई दरवाजा (अशोक वाजपेयी) ये दोनों कविता संग्रह इस बात के उदाहरण हैं जो 2014 और 2013 में क्रमश: छप कर आए हैं। दोनों के पास कविता लिखने का लगभग पचास साल या उससे ज्यादा समय का अनुभव है। भाषा पर इन दोनों का समान रूप से अधिकार है और ये चाहें तो सिर्फ अभ्यास से भी कविता लिख सकते हैं और लोग कह सकते हैं कि कविता अच्छी बन पड़ी है। लेकिन कविता बन पढ़ने की चीज नहीं है बल्कि रची जाती है और इसका रचा जाना एक खास मनःस्थिति में ही संभव हो पाता है। दोनों इस बात से न सिर्फ अच्छी तरह वाकिफ होंगे बल्कि इसका अनुसरण भी करते होंगे फिर भी कोई बात है जो इन दोनों को एक दूसरे से अलग करती है। हम देखते हैं कि जहां एक ओर केदारनाथ सिंह का कविता-संसार व्यापक होता जाता है वहीं दूसरी ओर अशोक वाजपेयी का दायरा सिकुड़ता जाता है यद्यपि भौगोलिक रूप से देखें तो अशोक वाजपेयी की कविता देश की सीमा से बाहर निकल कर दूर तक फैलती दिखती है जबकि केदारनाथ सिंह की कविता महानगर से निकल कर कहीं पीछे छूट गए जनपदों में भटकते लोगों की गठरी और पोटली जैसी लगभग नगण्य चीजों की ओर जाती है। कोई कह सकता है कि आखिर इसमें ऐसा क्या है कि दूर तक फैलती कविता को सिकुड़ती जाती कविता और छोटी-छोटी चीजें को समेटती चलती कविता को व्यापक होती कविता कहा जा रहा है। वैसे भी यह तो कवि के स्वभाव और पहुंच से जुड़ा मसला भर है इसलिए इस आधार पर कुछ तय नहीं किया जा सकता। लेकिन बात सच में इतनी भर नहीं है बल्कि कहीं गहरे वहां तक जाती है जहां दो कविताएं एक दूसरे से अलग अपनी पहचान बनाने लगती हैं। यहीं इस बात के भी भेद छिपे हैं कि क्यो एक को सिकुड़ती जाती कविता और दूसरे को व्यापक होती कविता यहां कहा जा रहा है।

इसके पहले कि हम कविता में जाएं और इसकी वजहों की पड़ताल करें कुछ सूत्र जो हमारे हाथ लगे हैं उनका उल्लेख यहां करना अप्रासंगिक नहीं होगा। केदारनाथ सिंह ने अपना कविता-संग्रह अपने गांव के लोगों को समर्पित किया है जिनके बारे में उनका मानना है कि उन तक यह किताब कभी नहीं पहुंचेगी। जाहिर है कि इन पंक्तियों में कविता को लेकर कोई निराशा नहीं है बल्कि उस बाजार पर सवाल है जो लोगों तक कविता को पहुंचने नहीं देता। यानी कि जिस तरह से कविता बाजार के विरुद्ध खड़ी है उसी तरह से बाजार भी कविता के खिलाफ खड़ा है। इन पंक्तियों में वे इसी ओर इशारा कर रहे है। साथ ही वे यह भी कह रहे हैं कि उनकी कविता दूर जनपदों में उपेक्षित पड़ी जिंदगियों की कविता है इसलिए यहां एक सच्चे कवि की चिंता भी है जो सिर्फ लिख देने तक ही अपना दायित्व नहीं समझता बल्कि जिसके लिए लिखी गई है कविता वहां तक पहुंचे इसे भी वह अपने काम का हिस्सा मानता है। जबकि दूसरी ओर हम देखते हैं कि अशोक वाजपेयी में कविता को लेकर एक प्रकार की निराशा है जो शायद कविता को लेकर निरर्थकता बोध से पैदा हुई है जिसने इस चौदहवें संग्रह के बाद उनके कविता लिखने की रफ्तार को थाम लिया है। अपने संग्रह की भूमिका के पहले पैराग्राफ में उन्होंने लिखा है:
अच्छी-बुरी कविता लिखते एक अधसदी से अधिक का समय हो गया है। पहला कविता-संग्रह 1966 में प्रकाशित हुआ था और यह चौदहवां 2013 में आ रहा है। हालांकि कविता को लेकर उत्साह और उम्मीद में कोई कमी नहीं हुई है, कविता लिखने की रफ्तार जरूर धीमी पड़ गई है जो ठीक ही है।

इन पंक्तियों से पता चलता है कि वे उत्साह और उम्मीद में कविता लिखते हैं लेकिन यह उत्साह क्यों है और उम्मीद किस बात को लेकर वे पाले हुए थे या हैं इसका जिक्र अपनी भूमिका में उन्होंने करने की जरूरत नहीं समझी और न इसका पता उनकी कविताओं को पढ़ने से चल पाता है। आखिर वह कैसी उम्मीद थी जो बकौल उनके अब भी बनी हुई है लेकिन कविता लिखने की रफ्तार धीमी पड़ गयी है जिसे वे अच्छा बता रहे हैं। वे यहां फिर यह बताने की जरूरत नहीं समझते कि यह अच्छा कैसे है क्योंकि इस पंक्ति में यह आशय भी छिपा हुआ है कि पहले जरूर कुछ था जो बुरा था। अगर बुरा था तो क्या और क्यों इस पर भी उन्हें रोशनी डालनी चाहिए थी लेकिन वे ऐसा कुछ नहीं करते। कविता लिखने के लिए जिस आंतरिक मनःस्थिति की जरूरत पड़ती है क्या उस मनःस्थिति में कविता नहीं लिखा जाना भी संभव है जो अब वे कम लिख रहे हैं या पहले वे अभ्यासवश भी कविता लिख जाते थे जैसा करने का उन्हें अब कोई प्रयोजन नजर नहीं आ रहा है। क्या हम यह न मान लें कि जिसे वे उत्साह या उम्मीद कह रहे हैं दरअसल वह इच्छाएं थीं लेकिन कोई प्रयोजन-चाहे वह जो भी हो-सिद्ध ना होता देख कर जन्मी हताशा ने कविता लिखने की रफ्तार को थाम लिया है। भला सोचिए कविता लिखने की भी कहीं कोई रफ्तार होती है जिसका वो जिक्र कर रहे हैं। यहां तो गहरे उतर जाने वाली बात होती है।  

ऐसा क्यों होता है कि एक ही समय में लिखते हुए भी दो कवियों का विकास भिन्न तरीके से होता है। हम देखते हैं कि जो कवि कविता की चिंता करता है वह सिमटता जाता है फिर भी वह ऐसा करता है और वह भी उसी समय में जिसमें दूसरा कवि दुनिया की चिंताओं से कविता का जोड़ता चलता है और व्यापक होता जाता है। क्यों एक को चिंता नहीं होती कि वह सिमटता जा रहा है और वह भी इस हद तक कि कविता का कोई मकसद भी होता है उसे यह दिखना बंद हो जाता है जबकि दूसरा दुनिया भर के दुख और संघर्ष से जुड़ने की हर संभव कोशिश में लगा रहता है। जाहिर तौर पर विचारधारा होना और विचारधारा नहीं होना यह अंतर पैदा करता है। वही विचारधारा जिसे इन दिनों अप्रासंगिक करार देने की मुहिम सी कुछ लोगों ने साहित्य में चला रखी है। यहां तक कि उसे मृत तक घोषित किया जाने लगा है जबकि आज के विषमता भरे समय में कविता के लिए यह प्राणवायु की तरह है। यह धारणा केदारनाथ सिंह और अशोक वाजपेयी की कविता को पढ़ते हुए और भी पुरजोर तरीके से पुष्ट होती है कि कैसे इसका होना या नहीं होना काम करता है। कैसे यह प्राणवायु केदारनाथ सिंह की कविता को समय के एक जीवंत दस्तावेज में बदल देती है जबकि इसके बिना अशोक वाजपेयी की कविता निरुद्देश्य भटकती हुई प्रतीत होती है। और इस भटकाव में भी कोई आवारगी नही है दीवानापन नहीं है बल्कि हड़बड़ी है। ’तेजी से क्यों?’ कविता में वे खुद कबूलते हैं ’हमारी मुश्किल है हमारी हड़बड़ी’। आखिर यह हड़बड़ी क्यों है? इसी कविता में वे एक जगह लिखते हैं:

जिस अनन्त वर्तमान में रहने को अब हम विवश हैं
उसमें स्मृति की जगह नहीं बची है
याद करना अपने को गुनाह में शामिल करना है।

यहां ’अनन्त वतर्मान’ शब्दावली ध्यान देने योग्य है। साफ है कि वे यह मान कर चल रहे हैं कि यह पूरा समय एक अनन्त वर्तमान की तरह है, इतिहास का अंत हो चुका है और इस पर अब बहस करने के लिए भी कुछ नहीं बचा है। अगली पक्तियों में वे ऐसा ही कुछ कह भी रहे हैं। बात सिर्फ इतनी ही भर नहीं है कि कविता इतिहासविहीन है बल्कि यह भविष्योन्मुखी भी नहीं है क्योंकि भविष्य के सपने इतिहास के गर्भ में पलते हैं और विचारधारा उसे निश्चित आकार देती है। अशोक वाजपेयी इन दोनों का निषेध करते हैं अतः वे ’अनन्त वर्तमान’ में रहने को अभिशप्त हैं। वे इस बात को समझते भी हैं लेकिन इस स्थिति से उबरने का कोई संघर्ष उनकी कविता या कविता की चेतना में दिखाई नहीं देता है। बल्कि इसके उलट एक प्रकार की स्वीकारोक्ति है। कोई दुख या क्षोभ भी नहीं है बल्कि एक तरह का सहज भाव है जो कविता को लम्पटता की हद तक ले जाता है। उपरोक्त कविता में एक जगह ये पंक्तियां आती हैं:

दूर से दुख, भले वह करोड़ों का रहा हो
जिनका संहार हुआ और जिन्हें उसका कारण
या अपना दोष तक पता नहीं चला
रंगीन-सा लगता है।

एक दूसरी कविता ’अपने शब्द वापस’ की इन पंक्तियों को देखिये:

शब्दों का इतिहास होता है
पर मेरे शब्द उसमें होंगे
ऐसी दुराशा करने का कोई आधार नहीं।

इसी कविता के अंत में जैसे हाथ खड़े करते हुए वे कह उठते हैं:

सचाई, शब्दों से, कम से कम मेरे शब्दों से
दूर जा चुकी है
और अब तो यह मानना तक मुश्किल है
कि वह कभी इन शब्दों में थी।

सवाल है कि अगर शब्दों में सचाई या कहना चाहिए कि अर्थ नहीं है तो क्यों नहीं है। जाहिर है कि शब्दों में सचाई या अर्थ जीवन से आते हैं। जीवन जितना अर्थपूर्ण और समर्पित होता है शब्द भी उतने ही अर्थपूर्ण और सच के रूप में सामने आते हैं और कई बार तो जीवन का नया आयाम खोलते हुए एक बिल्कुल नया अर्थ प्रकट कर जाते हैं। आप जिसके लिए जी रहे हैं आपकी कविता भी उसी के लिए होगी। इस भ्रम में रहने की कोई जरूरत नहीं कि आपकी कविता सब के लिए होगी। ठीक वैसे ही जैसे कि आप सबके लिए जी नहीं सकते। अगर आप यह भ्रम पैदा करने में सफल हो भी जाते हैं तो कविता सब कुछ उजागर कर देती है। संग्रह की अंतिम कविता ’कहां से उठाऊं शब्द’ बता देती है कि कवि तय नहीं कर पाया है कि वह किस ओर है। एक उहापोह की स्थिति है। और वह भी ऐसी कि वह चीजों को जोड़ कर नहीं देख पा रहा है। टुकड़े-टुकड़े में देख रहा है। अगर ऐसा है तो फिर जुड़ाव कहां से हो, कोई भी पक्ष कैसे सामने आए, जुझारूपन तो दूर की बात है। ’ऐसा क्यों हुआ’ कविता में वे कहते हैं:

हमें भ्रम है कि हम साहसी थे
जब साहस की सबसे ज्यादा दरकार थी
हम आगे की कतार में नहीं थे।

यहां वे ’हम’ शब्द का इस्तेमाल पता नहीं किन लोगों के लिए कर रहे हैं। वह हर जगह एक अकेले व्यक्ति की तरह दिखते हैं किसी संगठन या आंदोलन में शरीक कार्यकर्ता की तरह नहीं। फिर इस ’हम’ का क्या मतलब है। अगर यहां ’हम’ की जगह ’मैं’ होता तो मैं यह मान लेता कि वह जो कुछ कह रहे हैं वह उनकी ईमानदार स्वीकारोक्ति है लेकिन ’हम’ कह कर उन्होंने जो धुंधलका खड़ा करने की कोषिष की है वह उनकी ईमानदारी पर सवाल खड़े कर जाती है। यह मैं यूं ही नहीं कह रहा हूं बल्कि देखने में यह आता है कि अनेक दूसरी कविताओं में उन्होंने ’हम’ नहीं बल्कि ’मैं’ का इस्तेमाल किया है जैसे कि ’फिर भी आवाज सुनाई देती है’, ’भले’, ’अब सब कुछ को’ , ’अपने शब्द वापस’, ’तीन कविताएं’, ’विनय गीत’, ’मैंने’ आदि बहुतेरी कविताओं में देखा जा सकता है।

दूसरी ओर हम देखते हैं कि केदारनाथ सिंह की कविता का स्वर अशोक वाजपेयी की कविता के मुकाबले कहीं ज्यादा समकालीन है। आसपास की आवाजें, बदलते रुख को यहां सुना और देखा जा सकता है। कई नाम मिलेंगे, कई जगहें मिलेंगी, कई घटनाएं मिलेंगी जो अपने जीवन में घटती रहती हैं, कई दृश्य आते हैं जो आपकी अपनी आंखों से देखी हुइ्र होती हैं और यह सब मिल कर कविता जो संसार रच जाती है वहां आपके जीवन के कई सारे अर्थ खुलने लगते हैं। संग्रह के नाम ’सृष्टि पर पहरा’ के नाम से संग्रह में एक छोटी कविता भी है जिसमें वे लिखते हैं:

कितना भव्य था
एक सूखते हुए वृक्ष की फुनगी पर
महज तीन-चार पत्तों का हिलना
उस विकट सुखाड़ में
सृष्टि पर पहरा दे रहे थे
तीन-चार पत्ते।

सूखता हुआ वृक्ष दुख का वह पहाड़ है जिसे वे पत्ते अपने अंदर समेटे हुए ऊपर निकल आए हैं। वे तीन चार पत्ते कविता हैं जो दुख के पहाड़ से निकले हैं शायद इसीलिए वह सही मायने में कविता की भूमिका अदा कर पाते हैं। ये कविताएं जूझते या लड़ते आदमी के हाथ में पतवार या तलवार की तरह होती हैं या नहीं तो कम से कम उसे यह अहसास जरूर करा जाती हैं कि वह कोई महती काम में शरीक है, उसका जीवन-संघर्ष निरर्थक या नगण्य नहीं है बल्कि वह जीवन-समर में जरूरी हस्तक्षेप कर रहा है। असफलताओं की मार से इस तरह ये कविताएं उसे बचाती हैं हालांकि मैं तुलनात्मक अध्ययन नहीं करना चाह रहा लेकिन मुझे जरूरी लग रहा है कि यहीं पर अशोक वाजपेयी की ’इतनी भर’ कविता पर भी बात कर ली जाए नहीं तो हो सकता है आगे मौका न मिले क्योंकि उनकी कविताओं को लेकर जो कुछ कहा जाना था कहा जा चुका है। ’इतनी भर’ में वे लिखते हैं:

दुनिया इतनी भर बची है
जितनी एक कविता में आ जाए
दुनिया इतनी भर है अब
जितनी एक उपन्यास में समा जाए
दुनिया इतनी भर बाकी है
जितनी एक बच्चे की किलकारी में बस सके।

यानी कि दुनिया को वे उतनी ही भर मान रहे हैं जो किसी बच्चे की किलकारी सी निष्छलता, मासूमियत और पवित्रता को बिना नष्ट किये उसमें आ सके। यही शर्त कविता के साथ भी दुनिया को लेकर लागू है जैसा कि प्रारम्भिक पंक्तियों में वे कहते हैं। यानी कि कविता से वे एक ही झटके में जिंदगी के उन तमाम पहलुओं को बाहर निकाल फेंकते हैं जो धूसर है, जिसे व्यवस्था की चालाकी, मक्कारी और बेईमानी ने पस्त होती या फिर लहूलुहान होती जिंदगी की ओर धकेल दिया है, जहां संघर्ष है, हताशा है फिर संघर्ष है और फिर फिर संघर्ष है। जबकि केदारनाथ सिंह की कविता इसी मिट्टी से तप कर निकली है। कविताओं में एक मद्धम राजनीतिक स्वर भी है जो रह रह कर सुनाई देता रहता है। कई बार यह स्वर अबूझमाड़ के जंगलों से भी उठता सुनाई देता है और अचानक सुनने वाला चौंक पड़ता है।

केदारनाथ सिंह हिंदी के संभवतः पहले बड़े कवि हैं जिनकी कविता में माओवादी राजनीति की धमक सुनाई पड़ती है। यह बेहद महत्वपूर्ण है इस अर्थ में कि कवि जो महसूस करता है उसे वह बिना इस बात की चिंता किये कि यह अभिव्यक्ति उसका नुकसान भी कर सकती है वह उसे कविता में उसके पूरे अधिकार और सम्मान के साथ रखता है। एक ऐसे समय में जब लोग ईमानदारी को ताख पर रखकर अपने नफे-नुकसान के गणित में इस कदर मशगूल हैं कि उनकी सवेदना को ऐसी बातें छू भी नहीं पातीं वहीं केदारनाथ सिंह इस जोखिम को उठाते नजर आते हैं। इस पहल को सभी नोटिस में लें यह जरूरी है क्योंकि तभी यह संग्रह एक अर्थ में हिंदी कविता का टर्निंग प्वायंट हो सकता है। यह हिंदी कविता के अराजनीतिकरण के छद्म को तोड़ता है। इस संग्रह का महत्व क्यों और कैसे है यह समझने के लिए जरूरी है कि साहित्य और राजनीति के वर्तमान परिदृश्य को समझ लिया जाए। दरअसल पिछले दिनों हुआ यह कि व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई से खुद को अलगाने की कोशिश में कविता या तो ’निरुद्देश्य भटकती’ कविता होकर रह गयी या फिर सामाजिक रूढि़यों से लड़ती पहचान की राजनीति करती हुई स्त्री विमर्ष या दलित विमर्ष की राजनीति में सिमट गई जो कहीं न कहीं से इसी व्यवस्था को मजबूत बनाये रखने का काम करती है। इसका नतीजा यह हुआ कि कविता भाषा, विचार और सत्ता के स्तर पर जकड़ गई। ऐसे समय में सबसे बड़ी चुनौती साहित्य को उसके इस जकड़न से निकालने की है। यह कहना अभी मुश्किल है कि माओवाद की लड़ाई को इस तरह की कविता से ताकत मिलेगी या नहीं लेकिन यह तय है कि माओवाद की लड़ाई की जो ताकत है वह कविता को उसके जकड़न से जरूर मुक्त कर सकती है और उसे जनता के बीच पुनः प्रतिष्ठित कर सकती है। केदारनाथ सिंह ने इस संग्रह के जरिये यही काम किया है। संग्रह में एक कविता है ’कविता’ शीर्षक से जिसमें वे यह बताते हैं कि वास्तविक कविता कहां है। उनका साफ मानना है वह वहां नहीं है जहां मंच है, पुरस्कार है प्रतिष्ठान है और उसका संरक्षण है। वे कहते हैं

सरकारें परेशान
कि क्या करें-क्या करें इस कविता का
कि हवा दो
पानी दो
टैक्स में दे दो चाहे जितनी छूट
पर वोट मांगने जाओ
तो कभी अपने पते पर मिलती ही नहीं
जाने कैसी बनैली प्रजाति की लतर है
किसी राष्ट्रीय उद्यान में
खिलती ही नहीं।

फिर कहां है कविता। इसी कविता में पूरे आत्मविश्वास से वे बताते हैं कि वह कहां है:

पता लगा लो-जो मारे जाते हैं जंगलों में
उन युवा होंठों पर
अक्सर होती है कोई न कोई कविता।

मरते वक्त भी जिसके होंठों पर कविता होगी कोई शक नहीं कि कविता भी उसी की होगी, उसी के गीत गाएगी।

एक छोटी कविता है ‘बाजार में आदिवासी’ जिसे यहां पूरा का पूरा रखा जाना जरूरी है:

भरे बाजार में
वह तीर की तरह आया
और सारी चीजों पर
एक तेज हिकारत की नजर फेंकता हुआ
बिक्री और खरीद के बीच के
पतले सुराख से
गेहुंअन की तरह अदृश्य हो गया
एक सुच्चा
खरा
ठनकता हुआ जिस्म
कहते हैं वह ठनक अबूझमाड़ में
रात बिरात
अक्सर सुनाई पड़ती है
मिला कोई गायक
तो एक दिन पूछूंगा
संगीत की भाषा में
क्या कहते हैं इस ठनक को?

सात सुरों से सजे शास्त्रीय गायकों के लिए इसका जवाब ढूंढ पाना सरल नहीं होगा कि आखिर महज तीन सुरों में गाने वाले इन आदिवासियों ने यह कैसी ठनक पैदा कर दी है जिसका जवाब खंगालने से भी नहीं मिल रहा है। समझा जा सकता है कि कविता और संगीत की धुन पर जिस आंदोलन के कदम उठ रहे हों उसे बमों और गोलियों की बौछारों से ध्वस्त नहीं किया जा सकता। भला ध्वस्त किया भी कैसे जा सकता है जहां सिर्फ कान ही नहीं पांव भी सुनते हैं। ’पांव’ कविता में वे कहते हैं:

कभी चलते हुए अचानक
अगर तेज-तेज चलने लगे तुम्हारे पांव
समझना उन्होंने सुन ली है
किन्हीं जंजीरों की झन-झन

’जहां से अनहद शुरू होता है’ की पंक्तियां हैं:

कोहरे में ये घंटियों की आवाज
कहां से आ रही है सुबह-सुबह
क्या आज फिर कोई मीटिंग है
झरही किनारे
या बेलवा जंगल में

संग्रह में एक गजल है जिसका एक शेर इस प्रकार है:

इक शख्स वहां जेल में है सबकी ओर से
हंसना भी यहां जुर्म है क्या पूछ लीजिए

दरअसल देखा जाए तो इस तरह की पंक्तियां बिखरी पड़ी हैं संग्रह में। ’गुमशुदा कवि’ में वे लिखते हैं:

हर चेहरा लगता है
एक लपट के जैसा

या ’चुप्पियां’ में कहते हैं:

चुप्पियां बढ़ती जा रही हैं
उन सारी जगहों पर
जहां बोलना जरूरी था

आप कह सकते हैं कि इसी चुप्पी को तोड़ने की कोशिश है यह संग्रह। इस बेहद नाजुक दौर में यह संग्रह एक जरूरी हस्तक्षेप की तरह है।