Saturday, February 1, 2014

prashant rahi letter : IIT BHU से b.tech किये हुए सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार प्रशांत राही (जो राजनितिक बंदियों के रिहाई के लिए कार्य कर रहे थे) का जेल से पत्र :

जिसको लेकर यूएपीए के खिलाफ उनके सहपाठियों एवं अन्य साथियों द्वारा देश - विदेश भर में कम्पैन चलाया जा रहा है ...............
मेरे कानूनी मसलों और जरूरतों के विषय में समस्त जानकारी आप मेरे अधिवक्ता शिव प्रसाद सिंह से ले सकते हैं। ये उपलब्ध हैं इस फोन नंबर परः $91 8303481839; और इस ईमेल आईडी परःshivpsingh@gmail.com
                                               -प्रशान्त राही

दिनांकः 07 जनवरी 2014
प्रिय दोस्तों,
    संघर्षों से भरपूर एक नये साल की शुरूआत पर हार्दिक अभिनन्दन ! दुनिया भर में नागरिक (संवैधानिक) और जनवादी अधिकारों पर कुठाराघात का सिलसिला बढ़ता जा रहा है। पुलिस जुल्म हमारे यहाँ एक आम नियम सा बन गया है, जबकि कुछ देशों में पुलिस की बर्बरता अपवाद होने के कारण अधिक चर्चा का विषय बन जाती है, लेकिन गौर करने की बात है कि भारत समेत दुनिया के अनेक देशों में आतंकवाद-निरोधक कानूनों के चलते, उन कानूनों के चलते पुलिस जुल्म गंभीर हो गया है जो अमेरिका के सीने पर हुए 11 सितम्बर 2001 के प्रहार की प्रतिक्रिया के रूप में बने थे। जबकि 11 सितम्बर 2001 की प्रतिक्रिया में इराक और अफगानिस्तान में अमरीकी साम्राज्यवाद की जो आक्रमणकारी मुहीम चल पड़ी थी, अब वापस लिये जाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। फिर भी पिछले 10-12 सालों से अस्तित्व में रहे ये निरंकुश कानून जस के तस रह गये हैं। जी हाँ, ....... बात यूएपीए अर्थात् विधिविरूद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम की हो रही है। यूँ तो यह कानून जब 1967 में बना था तब भी अनावश्यक था, क्योंकि हमारे देश में किसी भी गंभीर राजनैतिक प्रतिरोध और विकल्प को दबाने के लिए औपनिवेशिक गुलामी की देन भारतीय दण्ड संहिता अपने आप ही पर्याप्त दमनकारी रही है। लेकिन 2004 में यूएपीए में जो ‘आतंकवाद’ पर नयी परिभाषा के साथ नया अध्याय जोड़ दिया गया (जिसे मिनी-पोटा कहा जा सकता है), और फिर 2008 में हमारे यहाँ की 26 नवम्बर की घटना के बाद उसकी आड़ में यूएपीए में फिर बड़े जबरदस्त संशोधन करके लगभग पोटा जैसी ही स्थिति में पहुँचा दिया गया। इसी कानून के तहत मेरी दोबारा गिरफ्तारी और हिरासत में यातना और उसके पहले गिरफ्तार हुए हेम मिश्रा की यातना का जो मसला आज एक मुद्दा बना है और अखबारों से हमें आपकी ओर से हजारों-हजार चिट्ठियाँ महाराष्ट्र शासन और पुलिस को भेजे जाने की जानकारी मिली है, साथ ही हमारे उत्तराखण्ड के मुकदमें और 2007 की यातनाओं से सम्बन्धित अधिकारियों को दण्डित करने की आपने मांग की है, उस सब की भावी दिशा क्या हो, वास्तव में हमें आपकी ओर से किस तरह की मदद की जरूरत है, इस सबके विषय में मेरा यह पत्र है।
शुरूआत में कुछ ब्यौरा, जरा-सा लम्बा ही, हमारे इसी मौजूदा जुल्म के तजुर्बे के बारे में और अन्त में हमारे निष्कर्ष पेश हैं-
1.    अहेरी में हम पर दाखिल हुआ है अपराधिक मुकदमा क्रमांक 3017/2013, जिसमें आरोप-पत्र अभी तक नहीं आया है। दरअसल हमारी गिरफ्तारी के बाद 6 महीने, जी हाँ, पूरे 6 महीने तक इसके लिए इन्तजार करना पड़ने वाला है। 2008 के बाद के यूएपीए आरोपितों के साथ ऐसा ही होता है। इस कानून की धारा 43 के आगे धारा 43;कद्ध जो जोड़ी गयी है, जिसकी उपधारा 2 में बिना आरोप लगाये ही 6 महीने तक जेल में बन्द रखने की छूट दी गई है, पुलिस को। गड़चिरोली जिले की पुलिस इस छूट को भला क्यों न प्रयोग में लाये ? इस पिछड़े, महाराष्ट्र के, जिले की अति-पिछड़ी, आदिवासी-बहुल, दूरस्थ तहसील अहेरी में तो पुलिस अपने हर विशेषाधिकार का भरपूर इस्तेमाल करती है। ‘‘आन्तरिक सुरक्षा’’ के नाम पर गड़चिरोली के इस तरफ के हिस्से को ‘‘पुलिस जिले’’ का दर्जा प्राप्त है। यानि जिला प्रशासन, ‘‘विकास कार्यों’’, न्यायपालिका आदि पर हक़ीक़त में पुलिस अधिकारियों का ही नियंत्रण है। यहाँ के कस्बों और सड़क किनारे के गाँवों पर इनका वैसा ही बोलबाला दिखायी देता है जैसा कि गुलाम देश पर आधिपत्य जमायी हुई किसी सेना का। कमाण्डो पुलिस, आरक्षित बल, सी.आर.पी.एफ. और उनका पूरा तामझाम। इस पर यहाँ तैनात होने वाले अधिकारियों को आउट-आफ टर्न (समय से पहले) पदोन्नति व डेढ़ गुना अधिक वेतन एवं भत्ते प्राप्त हैं। जिसकी पूर्ति हम सबकी गाढ़ी कमाई से ही होती है। स्थानीय आबादी के ये नये सामन्त बन बैठे हैं। यहाँ तक कि इस पूरे क्षेत्र के तीन-चार जिलों के प्रायः सभी पत्रकार इन्हीं अधिकारियों के जन-विरोधी युद्ध की प्रचारात्मक और मनोवैज्ञानिक जरूरतों की पूर्ति करते देखे जाते हैं। इनमें से एक-दो तो मानो इनके जरखरीद गुलाम ही हों। या फिर राष्ट्रीय व स्थानीय अखबारों के संवाददाता के वेश में पुलिस के प्रवक्ता ! और यहाँ जारी युद्ध, जिसका घोषित लक्ष्य ‘‘वामपन्थी उग्रवाद’’ का सफाया है, उन ‘‘जन मुक्ति’’ छापामारों को आमने-सामने की जंग में शायद ही कभी उलझा पाता है। छापामार यहाँ की आदिवासी आबादी के बीच घुलते-मिलते, भोजनादि जुटाते व संगठित करते हैं। हाथ नहीं लग पाते हैं। जिसका बदला उतारते हुए पुलिस गांव के आदिवासियों को चुन-चुनकर कानून के शिकंजे में फाँसती है और छापामारों में किसी के घर वापस लौट जाने या कमजोर पड़ जाने की खबर मिलते ही उन्हें पाला बदलकर अपना कारिन्दा बनाने की कवायद शुरू हो जाती है। इसी को यहाँ ‘सरेण्डर’ कहा जाता है। इस पूरी रणनीति को चलाने के लिए हम नागरिक अनजाने ही भारी मात्रा में अपना धन दे बैठते हैं। अहेरी इसी गड़चिरोली के विख्यात काउण्टर-इन्सरजेन्सी आपरेशन का एक आधार-क्षेत्र है। और इसी पुलिस ने हमें बाहर से उठाकर गैर-कानूनी तरीके से यहाँ लाया। एक के बाद एक दस दिन तक हुई कुल 5 लोगों की गिरफ्तारी। जिनमें दिल्ली व उत्तराखण्ड के सुदूर शहरी क्षेत्रों के होने के कारण सनसनीखेज खबरों के सिलसिले को किसी रचे-रचाये एक्शन ड्रामा के अन्दाज में चलाया गया और क्लाइमैक्स हुआ दिल्ली में, जब देश भर के अनेक पुलिस प्रमुखों की केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिन्दे की अध्यक्षता में हुई सभा में गड़चिरोली को नक्सल-विरोधी ‘‘एरिया डॉमिनेशन’’ रणकौशल के ‘‘रोल-मॉडल’’ की हैसियत अदा कर यहाँ के पुलिस अधीक्षक, हाल ही में अमेरिका, आदि की यात्रा कर आये सुवेज हक़ को नायक का दर्जा दिया गया। महाराष्ट्र और दिल्ली से लेकर उत्तराखण्ड तक कांग्रेस-नीत सरकारों की उपस्थिति की स्थिति में सम्बन्धित सारी पुलिस और खुफिया एजेन्सियों को जन-आन्दोलन के कार्यकर्ताओं के जो यात्रा-विवरण अपने छुपे हुए सूत्रों व साधनों से प्राप्त होता रहता है उसका, जाहिरा तौर पर, बखूबी दुरूपयोग किया गया ! इस तथ्य को उजागर ही नहीं होने दिया गया कि 2 सितम्बर 2013 को मुझे अपने 2007 के मुकदमा अपराध संख्या- 3222/2007, सत्र परीक्षण संख्या- 83/2008 की निर्धारित अन्तिम अभियोजन गवाही की अत्यावश्यक सुनवाई पर हाजिर होने के लिए वापस उत्तराखण्ड लौटना था !!
2.    इसी 2 सितम्बर को मुझे हेम मिश्रा, आदि के खिलाफ हाल ही में दर्ज मुकदमा अपराध संख्या- 3017/2013 में वहाँ वे विवेचना अधिकारी सुहास बावचे के मार्फत अहेरी के मजिस्टेªट न्यायालय में पेश किया गया।
3.    पुलिस उपाधीक्षक सुहास बावचे ने न्यायालय की आँखों में धूल झोंकते हुए यह दावा किया कि मुझे पड़ोस के गोन्दिआ जिले के एक स्थान से गिरफ्तार किया गया है जबकि महाराष्ट्र के इस क्षेत्र में न तो मेरी आने की कोई योजना थी और न ही मैंने इस क्षेत्र को टेªन से गुजरने के अलावा करीब से कभी देखा था। फिर अपनी गिरफ्तारी के स्थान तक मैं कैसे पहुँचता ?
4.    वास्तव में मैं सर्वथा निरीह अवस्था में सड़क पर किसी बस या ऑटो का इन्तजार कर रहा था- महाराष्ट्र की सीमा से बहुत दूर, जब मेरा अपहरण कर लिया गया। 2 सितम्बर के पर्याप्त पहले। काले रंग के वाहन में जबरन डाला गया, जिसके शीशे भी काले थे और नम्बर प्लेट केरल के, यानि की फर्जी। अपहर्ता महाराष्ट्र पुलिस के कर्मचारी सिद्ध हुए। अपने उच्चाधिकारियों के निर्देश पर ये सी.आर.पी.सी. और उच्चतम न्यायालय के गिरफ्तारी-सम्बन्धी निर्देशों का उल्लंघन करने निकल पड़े थे। अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर, राज्यों की सीमारेखाओं की परवाह किये बिना ही। एक पूरे दिन और रात की लगातार यात्रा जबरन कराये जाने के बाद मुझे 1-2 सितम्बर की रात अहेरी पुलिस थाने के लॉक-अप में ला पटका गया।
5.    मुझे उस दिन भी नहीं, कई दिन बाद मालूम हुआ कि मुझ पर आपराधिक षड़यन्त्र (120ठ आईपीसी) के आरोप के साथ ही विधि-विरूद्ध कार्य करने (13, यूएपीए), आतंकवादी संगठन का सदस्य होने (20, यूएपीए) और भाकपा (माओवादी) का समर्थन करने से सम्बन्धित (39, यूएपीए) जुर्म में शरीक होने के आरोपों के तहत गिरफ्तार किया बताया जा रहा है।
6.    नवम्बर के अन्त में गिरफ्तारी के लगभग 90 दिन बाद सुहास बावचे ने गड़चिरोली के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश के समक्ष अपनी तथाकथित जाँच की अन्तरिम रिपोर्ट पेश की। यह इसलिए कि यूएपीए की धारा 43;कद्ध2 के तहत प्राप्त अपने विशेषाधिकार के तहत मुझे 167 सी.आर.पी.सी. के तहत चार्जशीट जमा न किये जाने के आधार पर जमानत पर छूटने से रोका जा सके। इस तरह मेरी तकदीर के लेखक बावचे ने अपनी जाँच की अवधि 90 दिन और बढ़वा ली। न्यायाधीश ने मेरे इस मौखिक तर्क को सुना कि किस तरह जानबूझकर जाँच में विलम्ब किया जा रहा है और कैसे स्वयं बावचे की ही रिपोर्ट से यह सिद्ध होता है। मगर इन तर्कों को लिखित रूप में फाइल में दर्ज कराने से अधिक कोई लाभ नहीं मिल सका। अब मेरी गिनती भी उन सैकड़ों यूएपीए पीड़ितों में होगी जो चार्जशीट, यानि खुद पर लगे आरोपों की ठीक-ठीक जानकारी दिये गये बगैर ही 6 महीने तक बन्द किये गये हैं।
7.    विवेचना अधिकारी (आई ओ) सुहास बावचे की अन्तरिम रिपोर्ट कहती है कि हेम मिश्रा से (कथित रूप से) जब्त 16ळठ के मेमोरी कार्ड और दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी सह-प्राचार्य डा0 जे0 एन0 साईबाबा के घर से जब्त बताये गये सामानों में 4 टेराबाइट डाटा का अध्ययन कर मेरे खिलाफ सबूत जुटाने में अधिक वक्त लग रहा है। वक्त कुछ फरार बताये गये आरोपितों तक पहुँच पाने के लिए भी लग रहा है। जिनमें डा0 साईबाबा के अलावा हैं- दो व्यक्ति जो हेम की ही तरह कुछ माह पूर्व भाकपा (माओवादी) की वरिष्ठ नेता नर्मदा अक्का  से मिल आये थे; नर्मदा अक्का स्वयं, जिन्हें मेमोरी कार्ड का इन्तजार था और भाकपा (माओवादी) के महासचिव जिनसे मिलने के लिए मुझे और हेम को ‘‘साईबाबा द्वारा भेजा गया था,’’ जैसा कि पुलिस खाम ठोंक कर कह रही है। 
8.    हेम और उसके दो कथित सह-यात्रियों पाण्डू नरोटी और महेश तिर्की को भी चार्ज-शीट देने के लिए न्यायालय से इसी तरह कुल 180 दिनों की मोहलत ले ली गयी थी। गड़चिरोली के एक ही गांव के इन दो युवाओं को हेम के साथ 22 अगस्त 2013 को अहेरी बस स्टैण्ड से गिरफ्तार दिखाया गया था। इस समय विस्तार के लिए न्यायालय को सुहास बावचे ने हूबहू वही अन्तरिम जाँच रिपोर्ट सुपुर्द की थी जो मेरे संदर्भ में की।
9.    इस प्रकार इस विवेचना अधिकारी ने हमारे मुकदमे में चार्ज-शीट जमा करने के लिए फरवरी तक की मोहलत ले ली है। चार्ज-शीट पर अभियोजन शुरू हो या न हो, इसे तय करने के लिए यूएपीए के तहत राज्य और केन्द्र के गृह विभागों को अधिकृत किया गया है। केन्द्र और राज्य के गृह विभाग बावचे की अन्तिम जाँच रिपोर्ट पुलिस से सर्वथा स्वतन्त्र जाँच कराने को बाध्य हैं; जिसके आधार पर वे अभियोजन की अनुमति रोक सकते हैं या दे सकते हैं। वह भी तब जब बावचे की अन्तिम जाँच रिपोर्ट को डी.आई.जी. या डी.आई.जी. से ऊपर के किसी पुलिस अधिकारी उचित पायें। यूएपीए जैसे घोर-गैरलोकतांत्रिक कानून लागू करने पर यही एकमात्र अंकुश है। शासन का ‘‘अंकुश !’’ अभियोजन की अनुमति एक बार दे दी जाती है और उस अनुरूप बावचे अपनी केस डायरी व्यवस्थित रूप से लिख लेते हैं, उसके बाद यूएपीए 2008 के अनुसार हमें किसी भी अदालत से जमानत मिल पाने की उम्मीद न के बराबर रह जायेगी।
10.    जब जमानत नहीं मिल पायेगी तब जेल में रहकर जिस तरह की सुनवाई हो रही है उसे देखते हुए हमारे मुकदमें की सुनवाई कहीं से भी न्यायसंगत हो, इसकी गुंजाइश बिल्कुल नहीं है। यहाँ हम जैसे जेलबन्दियों को ‘‘सुरक्षा’’ के नाम पर अदालत में पेश नहीं किया जा रहा है। न तो यहाँ के बन्दी वकील से मिल पाते हैं, न ही बात कर पाते हैं। मुकदमे से सम्बन्धित अपनी बातें वकील के सामने गोपनीयता का पालन करते हुए हो सके, इस बात की तो दूर-दूर तक संभावना नहीं दिखाई देती है। ऐसे में न्यायसंगत ट्रायल की गुंजाइश भी दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती है।
11.    वर्तमान में कैदियों से, खासकर यूएपीए के तहत बन्द हुए कैदियों से वकीलों, रिश्तेदारों व मित्रों की मुलाकात की व्यवस्था बेहद खराब है। महाराष्ट्र कारागृह अधिनियम के प्रावधानों की आत्मा के विरूद्ध यह व्यवस्था जितनी बुरी है उतनी शायद किसी भी दूसरे प्रदेश में नहीं होगी। बन्दी अपनी बेचैनियों और तनावों से जहाँ तक हो सके, मुक्त हो पाये और सामान्य व सन्तुलित मनःस्थिति में रहते हुए अपनी ट्रायल का सामना कर सके, ऐसी स्थितियाँ कम से कम नागपुर के इस केन्द्रीय कारागृह और महाराष्ट्र पुलिस के रवैये व इन्तजामात को देखते हुए नदारद है।
12.    प्रसंगवश, यह भी ध्यान देने लायक है कि सुहास बावचे के उन तमाम प्रकाशित दावों में कोई दम नहीं है कि मेरा या हेम का कोई टॉर्चर नहीं हुआ। हम सभी को बेहद अमानवीय तरीके से यातनाएँ दी गयीं। बावचे ने स्वयं अपने हाथों से पाश्विक बल का प्रयोग किया। हमारे दिमाग व शरीर पर प्रहार किये, अपमानजनक गाली-गलौज की, कई हफ्तों तक दिन ही नहीं, रात-रात तक प्रताड़ित किया। हेम, पाण्डू, महेश को गड़चिरोली जिले के अहेरी में नहीं, बल्कि चन्द्रपुर जिले के बल्लारशाह रेलवे स्टेशन परिसर से अलग-अलग उठाया गया; 20 अगस्त को । 2 दिन तक उनकी बेरहमी से पिटाई सहित यातना देने के बाद 23 अगस्त को अहेरी कोर्ट में पेशी के लिए तैयार किया गया।
13.    हम पाँचों की ओर से जो भी बयान दर्ज कराये गये या जो अखबारों में छपवाये गये उनमें लेशमात्र का भी सत्य नहीं है। किसी भी पत्रकार को हमसे मिलवाया नहीं गया। यहाँ तक कि टाइम्स आफ इण्डिया की संवाददाता को भी मुझसे खुलकर बातचीत करने का मौका नहीं दिया गया। बावजूद, हमारी जो भी बातचीत हो पायी वह बेहद अधूरी और अपूर्ण थी।
14.    पुलिस उपाधीक्षक सुहास बावचे ने जो हमें मानसिक व शारीरिक यातनाएँ दीं उसके अलावा इस पूरी कार्यवाही की जिम्मेदारी पुलिस उप-महानिरीक्षक रवीन्द्र कदम और अनूप कुमार नाम के एक वरिष्ठ महानिरीक्षक के कन्धों पर थी। हमारी अवैध हिरासत, फर्जी गिरफ्तारी और झूठे मुकदमें के लिए ये उच्चाधिकारी योजना बनाने से लेकर उसके अमल तक के लिए उत्तरदायी हैं।
15.    इस दावे में भी कोई सत्य नहीं है कि छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के विजय तिर्की ने मुझे उस राज्य की राजधानी में रिसीव कर अबूझमाड़ तक पहुँचाने के इरादे से महाराष्ट्र के गोंदिआ जिले के देवरी-चिचगढ़ तिराहे तक पहुँचाया था, जहाँ पुलिस ने हमें पकड़ लिया हो।
16.    सच तो यह है कि विजय तिर्की को रायपुर के किसी स्थान से उठाया गया। मुझसे बिल्कुल अलग स्थान से। 1 सितम्बर को। उनकी मुझे या किसी को भी साथ ले जाने की मंशा रही हो या मेरी उनसे मिलकर साथ जाने की मंशा रही हो, कहीं भी- यह दावा सरासर झूठा है। विजय तिर्की नाम के व्यक्ति से मेरी पहली मुलाकात पुलिस की गिरफ्त में होने के दौरान हुई, अहेरी थाने के लॉक-अप में बीच रात पहुँचाये जाने के कई घण्टे बाद, सुबह होने से थोड़ा ही पहले, जब उन्हें भी उसी लॉकअप में ला पटका गया। मैं किसी वकील के लिए एक पेशेवर कार्य (अनुवाद) करने के सिलसिले में दूसरे वकील से भेंट कर आ चुका था और कुछ समय बाद उनसे कुछ कागजात उठाकर वापस उत्तराखण्ड लौटना था। ताकि उधम सिंह नगर की अपनी ट्रायल की सुनवाई के लिए हाजिर हो सकूं।
17.    उपरोक्त सत्य की ताकत के आधार पर ही मैं सुहास बावचे और उनके उच्चाधिकारियों की इस जिद के साथ सहयोग करने से लगातार इन्कार कर सका कि उनकी मर्जी के मुताबिक कोई बयान दर्ज कराऊँ। अबूझमाड़ नाम के किसी जंगल में या कहीं भी जाकर भाकपा (माओवादी) के किसी से मिलने के किसी इरादे की बात करने का कोई सवाल ही नहीं।
18.    बावचे की अन्तरिम रिपोर्ट की यह बात बेसिरपैर की है कि मैं और हेम दोनों ही साईबाबा द्वारा ‘‘भेजे गये थे।’’ हेम और साईबाबा के बीच की बातों से मुझे न तो कोई जानकारी है और न लेना-देना। जहां तक मेरी बात है, साईबाबा सिर्फ एक परिचित हैं, वे मुझे कहीं भेजें और मैं उनके कहने पर कहीं जाऊँ या जाने को बाध्य रहूँ ऐसा रिश्ता हमारे बीच नहीं है। वास्तव में 31 अगस्त से ठीक पहले या बाद में उनसे मेरी न तो कोई बातचीत हुई थी और न ही मुलाकात। ऐसे में भेजे जाने का कोई सवाल ही नहीं।
19.    इतना कहने पर अब मैं अपने उत्तराखण्ड के 2007 की यातना और तब से चल रहे मुकदमे की बात करता हूँ। सन् 1991 से ही मैं उत्तराखण्ड के देहरादून में रहकर अपना काम कर रहा हूँ। 2007 के दिसम्बर में अपनी गिरफ्तारी से 2-3 महीने पहले से भी मैं वहीं पर था। 17 दिसम्बर को मुझे वहाँ के आरा घर नामक क्षेत्र की एक बड़ी सड़क से दिन-दहाड़े उठा लिया गया था। अचानक कई लोगों ने पीछे से मुझ पर हमला किया था। हाथापाई के बाद गाड़ी में बैठाया गया और आंखों पर पट्टी बाँधकर गाड़ी को तेजी से दौड़ाया गया। पहले हरिद्वार जिले के एक जंगल में शाम से शुरू हुई पिटाई रात भर चलती रही, जिस दौरान मुझे याद नहीं कि मैं कब बेहोश होकर गिर पड़ा। अगले दिन हरिद्वार के ही रोशनाबाद क्षेत्र में स्थित पी.ए.सी. बटालियन के परिसर में ‘‘पी.ए.सी. कान्फरेन्स रूम’’ में ले जाया गया जहाँ रात होने पर आँख की पट्टी पहली बार खोली गयी, जो 20 दिसम्बर तक खुली रही। इसी वजह से मैं उस प्रतिबन्धित क्षेत्र की पहचान उस स्थान पर जड़े संगमरमर के शिलापट की लिखावट, आदि से कर सका। यहाँ मुझे तरह-तरह की बर्बर यातनाएँ दी गयीं और फिर से आँख पर पट्टी लगाकर 20 की सुबह गाड़ी में बिठाकर शाम को एक जगह ले जाया गया, जहाँ 23 दिसम्बर तक एक बन्द कमरे में छुपाया गया। यह जगह उधम सिंह नगर जिले के नानकमत्ते पुलिस थाने के परिसर में स्थित थानाध्यक्ष निवास का एक कमरा था। यह जगह देहरादून से 350 किलोमीटर से अधिक दूरी पर थी। 5 दिन और 5 रात मुझे पल भर के लिए भी सोने नहीं दिया गया था। 22 की शाम को मुम्बई स्थित मेरी बेटी शिखा राही को गिरफ्तारी की सूचना दी गयी और 23 दिसम्बर को न्यायालय में पेश किया गया।
20.    मेरी गिरफ्तारी दिखाने के लिए यह कहानी गढ़ी गयी कि 20 दिसम्बर की शाम (जिस वक्त मुझे हरिद्वार से नानकमत्ता लाया जा रहा था) नानकमत्ता थाने में खुफिया सूत्रों के आधार पर एक एफ.आई.आर. दर्ज हुआ कि इलाके के जंगल में 3 महीनों से 20-25 माओवादी ग्रामीणों को जंगल युद्ध रणकौशल की टेªनिंग दे रहे हैं और मुझे इन भाकपा (माओवादी) के सदस्यों का प्रमुख बताकर नामजद किया गया। इस कैम्प के लिए जंगल में काम्बिंग करते समय एकाएक मुझे 4 अन्य माओवादियों के साथ देखा गया। पकड़ने के प्रयास में बाकी सभी, यानि चारों भागने में सफल हुए; अकेला मैं ही पकड़ा गया। कुछ ही समय में मैंने उसी जंगल में पुलिस को एक टूटा-फूटा लैपटॉप, पेनड्राइव, छपी पुस्तक-पत्रिकाएँ-दस्तावेज आदि बरामद करा दिये- इस तरह की मनगढ़न्त अनेक बातों की कहानी बुनी गयी। ताकि मुकदमें को तदबीर दिया जा सके। 3 माह के सैन्य प्रशिक्षण कैम्प पर धावा बोलने के बावजूद एक भी शस्त्र बरामद नहीं दिखाया जाना, अपने आप ही इस कहानी की असलियत उजागर करने के लिए काफी है।
21.    मुकदमा दर्ज किया गया आई.पी.सी. की धारा 121 (राज्य के विरूद्ध जंग छेड़ने या जंग में सहायता करने), 121। (राज्य के खिलाफ षड़यन्त्र करने), 124। (राजद्रोह- कानून द्वारा स्थापित सरकार को पलटने), 153ठ (देश की एकता-अखण्डता व सम्प्रभुता को खतरा पहुँचाने), 120ठ (उपरोक्त अपराधों को अंजाम देने की साजिश रचने) और यूएपीए 2004 की धारा 20 (ये सारे अपराध आतंकवादी संगठन के सदस्य के रूप में करने) के तहत।
22.    तीन साल 8 महीनों तक जेल काटने के बाद मैं उक्त मुकदमें में जमानत पर इसलिए रिहा हो पाया कि मुझ पर यूएपीए का 2004 का संस्करण लागू था; 2008 का संशोधन गिरफ्तारी के बाद हुआ है। मेरी गिरफ्तारी के बाद 3 अन्य लोग गिरफ्तार हुए- दिनेश पाण्डे और गोपाल भट्ट जो अपने-अपने घर पर ही रहकर रोजगार करते थे, और अन्त में चन्द्रकला, जिसकी गिरफ्तारी काशीपुर रेलवे स्टेशन, उत्तराखण्ड में दिखायी गयी। ये तीनों उत्तराखण्ड के जाने-पहचाने सामाजिक कार्यकर्ता रह चुके हैं और चन्द्रकला आज भी सक्रिय हैं। इन तीनों की जमानत पर रिहाई के बाद 21 अगस्त 2011 को मेरी रिहाई हुई।
23.    इस मुकदमा अपराध संख्या 3222/2007 की ट्रायल मेरी गिरफ्तारी के 8 महीने बाद एस.टी.नं. 83/2008 के बतौर शुरू हो सकी, जो अभी तक चल रही है। अगर अभी इस दूसरे मुकदमे में मेरी गिरफ्तारी नहीं हुई होती, तो 2013 के अन्त तक इस उत्तराखण्ड के मुदकमे में हम सब के बरी हो जाने की प्रबल संभावना थी।
24.    नागपुर के केन्द्रीय कारागृह में सितम्बर 21, 2013 को दाखिल किये जाने के बाद से एक बार भी उत्तराखण्ड के मेरे मुकदमे की सुनवाई के लिए पेश नहीं किया गया। महाराष्ट्र पुलिस उस अदालत के द्वारा हर बारी जारी होने वाले पेशी वारण्ट पर तामील करने से इन्कार करती रही है। कब तक ऐसा ही चलता रहेगा, अभी कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।
25.    उत्तराखण्ड और महाराष्ट्र केे मेरे इन दो मुकदमों के विवेचना अधिकारी (आई.ओ) और उनके उच्चाधिकारी अपने-अपने अभियोजन के प्रयास में दूसरे मुकदमें का प्रयोग अपने यहाँ के मुकदमे का वजन बढ़ाने के लिए प्रयोग करना शुरू कर चुके हैं और आगे भी करेंगे।
उपरोक्त  तथ्य, परिस्थितियाँ और आवश्यक सारी बातें जरूरी समझकर मैंने आपके सामने पेश कर दी हैं। आप सब दोस्तों से मेरी यही विनम्र गुजारिश है कि जो भी तकलीफें हमारे हिस्से आयी हैं उनके मूल कारणों पर गौर करना और उन मूल कारणों के उन्मूलन के लिए अपनी ऊर्जा केन्द्रित करना ज्यादा श्रेयस्कर होगा बजाय इसके कि आप महाराष्ट्र या उत्तराखण्ड राज्य में मुझे और हेम को यातना देने से रोकने, न्यायसंगत ट्रायल सुनिश्चित करने और दोषी पुलिस अधिकारियों को दण्डित करने के लिए की गई अपनी अपीलों पर ध्यान दिये जाने की उम्मीद करें। यह मुद्दा भले ही नागरिक और लोकतांत्रिक अधिकारों, अथवा मानव अधिकारों का हो, फिर भी यह सब इस तरह होता क्यों है, इसके कारण आखिर राजनीतिक ही हैं, इस बात को ध्यान में रखते हुए अपनी अपीलों को राजनीतिक स्वरूप के साथ आगे और अधिक विस्तार देने की जरूरत है। भारतीय राज्य और उसके विभिन्न अंगों के जन-विरोधी चरित्र को सामने लाने की जरूरत है। क्या यह काबिले गौर नहीं है कि देश में जब अभी आम चुनाव के द्वारा संसद को नये सिरे से गठित किया जाना है, तब एक भी वोट-बटोरू पार्टी ऐसी नहीं है, ‘‘रक्तहीन इन्क्लाब’’ लाने वाली आम आदमी पार्टी भी नहीं, जो जनता के विरूद्ध राज्य की सैनिक कार्यवाहियों को जरा भी धीमा करने की बात करती हो और गत 8-10 वर्षों की इस देन को उलटने का आश्वासन देती हो। 8-10 वर्षों से 3000 से अधिक तथाकथित माओवादियों को जो जेल हुई है, जिनमें से अधिकांश को फर्जी मुकदमों में फंसाया गया है, बर्बर यातनाएँ दी गयी हैं और अमानवीय बर्ताव किया गया है- पुलिस हिरासत में और न्यायिक हिरासत में भी- उस गति को रोकने और उलटने का मुद्दा उठाती हो, ऐसी ताकत कौन हो सकती है, सिवाय स्वय आप के ?            
यही वह चिन्ताएँ हैं जिनके कारण ऐसा लग रहा है कि महाराष्ट्र शासन और महाराष्ट्र पुलिस को लिखे आपके हजारों-हजार पत्रों में हेम और मेरे प्रति व्यक्त हुए आपके नैतिक समर्थन के क्रम में नई दिल्ली, मुंबई, देहरादून, रायपुर, रांची, पटना, कोलकाता, लखनऊ, चण्डीगढ़, भोपाल, अहमदाबाद, हैदराबाद, बंगलुरू, भुवनेश्वर, चेन्नई, तिरूवनन्तपुरम और गुवाहाटी में सत्तासीन सरकारों पर लाखों-करोड़ों पत्रों और नारों के साथ टूट पड़ना व्यापक हित में होगा जिनमें निम्न मांगें अंकित हों:-
1.    यूएपीए को वापस लो ! कम से कम 2008 और 2004 में हुए अन्यायपूर्ण संशोधनों को तो तत्काल ही वापस लो !
2.    वंचित और गरीबी की गर्त में धकेले गये लोगों की आवाज बुलन्द करने के प्रयास में लगे किसी भी संगठन को, चाहे वह राजकीय दमन का जवाब प्रतिहिंसा से देने की बात ही क्यों न करें, प्रतिबन्धित संगठनों की सूची में न रखें। जिसे रखा गया हो उसका नाम हटा दें।
3.    आतंकवाद की सन् 2000 से हुई परिभाषाओं पर पुनर्विचार कर कानूनी संशोधन करें। दुनिया पर बुश-ओबामा, पुतिन, अंजला, और मनमोहन सिंह व नरेन्द्र मोदी जैसों ने जो परिभाषाएँ लाद दी हैं उस दायरे से मुक्त हों। क्रान्तिकारी हिंसा को आतंकवाद के रूप में परिभाषित करना बन्द करें।
4.    निरंकुश कानूनों एवं कानून में हुए संशोधन के चलते जेलों में सड़ रहे सभी कथित माओवादी बन्दियों और एटीएस, आईबी, एनआईए जैसी तमाम खुफिया संस्थाओं के शीर्ष अधिकारियों की षड़यन्त्रकारी कोशिशों के तहत अथवा राजनैतिक कारणों से फँसाये गये तमाम बेगुनाह मुसलमानों को रिहा करें !
5.    जिन पर यूएपीए के तहत अभी जाँच जल रही हो और अभियोजन के लिए अनुमोदन (सैंक्शन) न दिया गया हो, खासकर उनके संदर्भ में जो युद्ध की कार्रवाई में सीधे शामिल होने के आरोप में विचाराधीन न हों या जो गाँव की आम आबादी का हिस्सा हों, आदिवासी या दलित हों या साधारण महिला हो, उनके ऊपर लगे मुकदमे में अभियोजन के लिए सभी सरकारें सैंक्शन देना तत्काल बंद कर दें।
6.    सभी यूएपीए के मुल्जिमों की ट्रायल त्वरित गति से चलायें ! अभियोजन के गवाहों को एक के बाद एक या एक साथ तत्काल और अविलम्ब पेश करना शुरू करें !
7.    यूएपीए के तहत जिस किसी के खिलाफ किसी भी प्रदेश के किसी भी जिले की अदालत में जो भी मुकदमा दर्ज हो, ऐसे हरेक मुकदमें में उसे हर तारीख पर बिना चूके पेश किया जाय। ‘‘सुरक्षा कारणों’’ जैसा कोई भी आधार बताकर उनकी पेशी न करना और ट्रायल में देर करना या ट्रायल से वंचित करना बंद करें !
8.    सभी प्रदेशों में ‘पश्चिम बंगाल करेक्शनल सर्विसेज ऐक्ट’ के मूल संस्करण की तर्ज पर राजनीतिक बन्दी का दर्जा मान्य किया जाय।
9.    सभी प्रदेशों के जेल मैन्युअल को ‘पश्चिम बंगाल करेक्शनल सर्विसेज ऐक्ट’ के अनुसार संशोधित किया जाय !
10.    अदालतों में मुकदमों के विचारण (ट्रायल) के लिए वीडियो कान्फरेन्स के साधन का प्रयोग न हो जहां भी ऐसा हो रहा हो उसे तत्काल बंद किया जाय।
11.    जेल मुलाकात के लिए सुरक्षा के नाम पर तैयार किये गये अवरोधों, जैसे जाली, शीशे की दीवार आदि को हटाया जाय। जेल की मुलाकातें मानव की गरिमा और इंसानियत के मानदण्डों के अनुरूप हों। यूएपीए के मुल्जिमों को प्रेस के समक्ष अपना पक्ष रखने व प्रकाशन का अधिकार दिया जाय।
12.    नागरिक एवं राजनैतिक अधिकारों, कैदियों के अधिकारों और निरूद्धि केन्द्रों के विषय में हुए अन्तर्राष्ट्रीय समझौतों (कोवेनण्ट्स) को अविलम्ब लागू करें।
इस मांग पत्र को संशोधित-संयोजित करने के लिए खुला रखें। कृपया अपनी कार्यवाहियों से मुझे सूचित करते रहें। इतना ही,
विचाराघीन केैदी
बैरकनव 8ए मघ्यवर्ती कारागृहए
नागपुर. 440020
एकजुटता के साथ, आपका
(प्रशांत राही)


                ............................ इंगलिश में भी ............................


ALL QUERIES ABOUT MY LEGAL ISSUES AND NEEDS BE DIRECTED TO MY ADVOCATE SHIV PRASAD SINGH, WHO IS AVAILABLE AT : Tel. +918303481839; Email : shivpsingh@gmail.com

- PRASHANT RAHI                              Dated : January 07, 2014


 Dear friends,


Heart-felt greetings at the onset of yet another tumultuous years of struggle for civil and democratic rights, which are increasingly threatened the world over by police atrocities perpetrated here as a normal course, and there as barbaric exceptions, in a setting of the yet retained post- 9/11 anti-terror laws in India and other parts, even though the U.S. imperialists seem to be back-tracking on their aggressive invasions in Iraq and Af-Pak! We, Indian activists, remain vulnerable, with none of the Parliamentary political forces even bothering to promise to repeal the 2008 and 2004 amendments in our Unlawful Activities (Prevention) Act – UAPA of 1967, which was indeed superfluous with the colonial Indian Penal Code (IPC) already draconian enough to stifle any serious political dissent. My arrest and torture in custody, as also that of Hem Mishra, the J.N.U. student of Chinese, which so many of you have cared to express concern about, according to newspaper reports, could be just the tip of an ugly iceberg. Even so, you might need to be apprised of the facts of our cases, and those of my ongoing Uttarakhand post-torture trial, so as to direct the raging passions in more effective ways.


It is with this view that I am putting across the following facts regarding what befell us:-


1.  Aheri, where our case is registered as a Criminal Case No. 3017/2013, with the charge-sheet yet to be submitted and not likely to be served until 6 months after our arrest, owing to the 2008 insertion of Section 43 (d), with its Sub-section-2, in the UAPA, is a backward and remote interior of Gadchiroli, where the state, with its heavy deployment of specialized police and paramilitary forces and helicopter squadrons, appear to have got an edge over the Maoist People’s Liberation Guerilla Army, well entrenched in expansive forests of South Chhattisgarh among the adivasi (aboriginal tribes) peasants, across the Maharashtra-Chhattisgarh State border. Part of Gadchiroli district is officially notified as a Police District, whereby the usual District Administration, Judiciary and “Development Activities” are controlled by police officials, who in turn move around in the towns and roadside villages like an occupation army, the citizens compelled to finance their pay packets, enhanced 150 percent as incentive, in addition to out of turn promotions and other allowances, and overriding powers to lord over the populace. The “free press”, even correspondents of reputed dailies, is a mere subservient tool of the security forces, eager to serve the propaganda and psychological needs of their war against “left-wing extremists”, also called Naxalites or Maoists, a war wherein the people’s guerillas seldom come face-to-face with the security forces, the latter victimizing the villagers, among whom the former mingle, feed and organize; compelling retired and weakened guerillas to defect (referred to, more often, as “surrender”). The funds, another largesse borne by the citizens, at the disposal of the police are enormous. Aheri, where we were forcefully and illegally brought to by this very police force, is one of the bases of Gadchirdi’s famed counter-insurgency operations, which, in the wake of our arrests, was lauded at a meeting of State Police Chiefs, chaired by the Union Minister of Home Affairs, Sushil Kumar Shinde, as a “role-model” for combat forces engaged in anti-Naxalite “area domination” tactics for the country. My arrest hardly 10 days after Hem’s may appear to many as a well-scripted drama, climaxing in the conferring of that status upon Gadchiroli, after news of  “Maoist supporter” from afar being implicated here had set the pace.


One would tend to believe that the Congress-led Governments of New Delhi could have found it convenient to co-ordinate tacitly with police forces in Uttarakhand and Maharashtra, both having Congress-led State Governments, as also with some coverts, or semi-coverts, within apparently friendly forces, to forcefully lead me or carry me to this part of the country, which could not have been on my itinerary at this conclusive and crucial stage of my 2007 Uttarakhand case, Criminal Case No. 3222/2007, Sessions Trial No. 83/2008, registered at Nanakmatta Police Station in Udham Singh Nagar district of that state. That too when I was awaited for the hearing of this trial on September 2, 2013, and due to head for Uttarakhand!


2. At Aheri, I was first produced in a Magistrate Court on precisely that day, the 2nd of September by the Investigating Officer (IO) of Cr. Case No. 3017/2013, Suhas Bawache, a Deputy Superintendent of Police.


3.  I was shown arrested in the neighbouring Gondia district of Maharashtra State.


4.  Actually, I have never been to Gondia district, nor seen the spot of arrest, as is claimed. Indeed, I had been abducted in the most innocuous circumstances, far beyond, the State of Maharashtra, well before September 2 (the claimed date of my arrest in Gondia); forcibly thrust into a dark-coloured van bearing fake number plates and shaded glass for its windows; and forced to travel with my abductors who turned out to be employees of the Maharashtra Police. They had transgressed their specified area of jurisdiction, with orders from their superiors to facilitate my fake arrest, in gross violation of the Criminal Procedure Code (Cr. P.C.) and specific directions on procedure for arrest issued by the Supreme Court of India. I was driven over a full day and night, straight to Aheri Police Station, with no one else being arrested along with me, having crossed several district and State borders.


5. The IO, Suhas Bawache knowingly hoodwinked the Courts so that cognizance be taken of my fake arrest and his allegations against me about a criminal conspiracy (Section 120B, IPC) to commit some unlawful acts (Sec.13, UAPA), as member of a terrorist organization (Sec. 20, UAPA), eliciting support for the CPI (Maoist) (Sec. 39, UAPA).


6. Subsequently, at the end of November, 2013, around 90 days after my arrest, Suhas Bawache submitted an interim report of his investigations to the learned Court of the Principal District and Sessions Judge at Gadchiroli, in a successful bid to seek extension by a further 90 days of the period for submitting a charge sheet against me, failing which I could be entitled automatically for release on bail under section 167, Cr. P.C. The learned Judge heard my contention that the investigation was being delayed deliberately on spurious grounds, my arguments having been given as written ‘Say’ filed among the case record. However, the provisions under Sec. 43(d) 2 of UAPA gave the IO the right to prolong my detention over a period of 180 days without being served a charge-sheet.


7. The IO pleaded in his interim report that it was taking long to study, and gather some incriminatory evidence against me, from the contents of a 16 GB memory card allegedly seized from Hem Mishra, and from 4 Terra Bytes of data from the hard disc and other storage devices allegedly seized in the second week of September from the residence of Dr. G.N. Saibaba, an English Associate Professor at University of Delhi. He also sought time to apprehend some alleged “absconders”, such as Dr. Saibaba; two persons alleged to have travelled, as Hem did and allegedly intended to, some months ago; one Maoist leader named as Narmada Akka to whom Hem was allegedly intending to deliver the 16 GB memory card; and the General Secretary of the CPI (Maoist), to visit whom in the Abujhmaad stronghold of the Maoist, Hem and I were allegedly “sent by Saibaba”, in connection with this case.


8. A similar 90 days extension had been permitted by the same Court to submit a charge-sheet against Hem Mishra and his two alleged escorts, Pandu Naroti and Mahesh Tirki, residents of a Gadchiroli village, all three having been shown arrested at Aheri Bus Stand on August 22, 2013. The interim investigation report submitted to the court by Suhas Bawache in support of this extension plea was identical, in fact a true copy of that submitted in my case a week later.


9.  Thus, effectively, the IO has secured time until February to prepare his charge-sheet against us, following which, as per the only modicum of safeguards guaranteed by the UAPA, the sanctioning authorities of the Maharashtra State Government and/or the Government of India would have to conduct a review of the investigation, independent of  Suhas Bawache and his superior authorities of or above the rank of Deputy Inspector-general of Police, before granting sanction in order to prosecute us. Once this procedure is completed according to the specified process, and a valid Case Diary is prepared by the IO, recording the procedure followed, even a higher court would be obliged, as per the 2008 insertion into UAPA under its Section 43 (d), Sub-section 5 to take an adverse view of our bail petitions.


10. Should bail be denied, the circumstances of trials being conducted by the Gadchiroli Sessions Court of incarcerated alleged extremists, meaning UAPA detenues, are such that the chances of a fair trial would only be slim and exceptional. This is so because of the current practice of conducting trials by video conference, whereby the accused persons do not normally get a change to interact with their defence counsel, least of all interact with her/him with the due freedom and confidentiality.


11.The prevailing system of prisoners being visited by their lawyers, relatives and friends is so full of hindrances and disturbances, far more so for UAPA detenues, that it violates the very essence of the Maharashtra Prison Act, which provides for considerable freedom and space to interact with and receive a wide range of visitors, as would be necessary to overcome our anxieties and tensions and maintain a normal and balanced state of mind.


12. Incidentally, it would be far from the truth to state or presume that I and my co-accused were not badly tortured by the IO, Suhas Bawache. All of us accused were tortured in the most inhuman manner. Mr. Bawache personally used brute force against me and the others, violated our minds and body, abused us, tormented and harassed us all through the days and nights over several weeks of our PCR, i.e. Police Custody Remand. Hem, Pandu, Mahesh, who were actually picked up from different places at Ballarshah in Chandrapur District of Maharashtra within the railway station premises on August 20, where badly mauled during 2 days of their illegal custody prior to the stipulated 24 hour period within which accused persons are required to be presented before a judicial court.


13. None of the accounts of our interrogation during illegal and legal custody of the police carried by the newspapers are true and complete. We did not get any opportunity to freely and sufficiently interact with journalists. Not even The Times of India could get free and sufficient access to talk with me.


14. Apart from the Deputy Superintendent of Police, Suhas Bawache and his subordinates who physically and mentally tortured me, Hem and the others, senior officials like the Deputy Inspector-general of Police, Ravindra Kadam; and an Inspector-general who called himself Anup Kumar were directly responsible for the entire episode and for implicating me unlawfully and for showing our arrests incorrectly and falsely.


15. There is not even an iota of truth in the claim that Vijay Tirki from Kanker District of Chhattisgarh received me at Raipur in that State, and thereafter escorted me up to a certain Devri–Chichgadh T-junction in Gondia, Maharashtra, enroute to Abujhmaad.


16. The fact is that Vijay Tirki was arrested separately, somewhere in Raipur, and he had no plan to escort me, nor did I approach him to be escorted to any destination. The first time that I met a person by this name from Kanker District of Chhatisgarh was several hours after I was dumped into the Aheri Police Station around midnight of 1st/2nd September 2013, when he too was thrown inside. As has already been reported, I was engaged in professionally translating some case papers for a lawyer; after meeting another lawyer who was my source for those papers, I was to collect some more papers from him shortly after the time of my abduction, and before proceeding to return to Uttarakhand to be present at an important hearing of my ongoing trial in Udham Singh Nagar District on September 2, 2013.


17. It was precisely on the basis of the above factual truth that I could withstand all the coercion by Suhas Bawache and his superiors to make out a fake confession about the imagined journey to Abjuhmaad, as per their will and desire.


18. I am not aware of any personal or organizational relationship between Hem Mishra and Dr. G.N. Saibaba, as is alleged. However, as far as I am concerned, there was no such relationship between the English Professor or his mass organization and me that he would “send” me somewhere, and I would agree, or that he or his comrades would depute me with couriering, or any task for that matter, and I would agree. In fact, the allegation that I saw him a couple of days before my formal arrest is absolutely baseless. I consider him and Hem mere acquaintances, not even friends of any significance that would lend credibility to any police claims.


19. With that, let me come to my Uttarakhand case, and torture in 2007. As is well-known I was living and working in Dehradun since 1991, and so was I all of the 2 or 3 months prior to my arrest in December, 07. On the 17th of December, I was picked up from a prominent street in broad daylight, close to Ara Ghar, after being attacked by several men all of a sudden, manhandled, blindfolded and carried away in a speeding car, first to a forest in the neighboiring Haridwar district, beaten up with sticks all through the first night, after which I collapsed. The next day, I was shifted to a Provincial Armed Constabulary campus of the Uttarakhand Police in Haridwar in a restricted part of Roshanabad, brought to a “PAC Conference Room”, where the blind-folding was first removed on the 18th night. There, I was tortured and harassed continuously till the 20th in various devious and inhuman ways, which I am omitting here to save space and for decency’s sake. On the 20th morning, I was again blindfolded, put into a car and driven several hours to be brought to Udham Singh Nagar, and hidden in a room of the residential quarters within the premises of Nankmatta Police Station, some 350 km. to the east of Dehradun. There, I was tortured by a different set of police personnel, until they could make up a story to show my arrest on the 22nd. Till the 5 days and 5 nights that elapsed after I had been picked up and illegally confined, I had not been allowed even a wink’s sleep. After informing my daughter Shikha Rahi, based in Mmbai, of my arrest on the 22nd evening, I was produced at a Magistrate’s Court on the 23rd.


20. The arrest story was that I was accosted in the forests near Nankmatta during a combing/search operation by a police party for a Maoist training camp, as reported in a F.I.R. lodged on the 20th, around the time I was brought to the police station premises from Haridwar, which 4 others, who were with me, fled the scene. Later, I allegedly helped recover a broken laptop, a pen drive and some printed material from the same forest (which I had never seen before, nor was I taken out there then), and the IO wrote out other cock and bull descriptions about an imagined 3-month long CPI (Maoist) military training camp, and now all the cadres and military trainers with their equally imaginary arms and ammunitions had vanished - all except me (who was already in their custody on the date of filing the FIR)!


21. A case was made out under the IPC Sections 121 (waging war or abetting the waging of war against the state), 121A (conspiring against the state), 124A (sedition), 153B (threatening the preservation of the nation’s unity and sovereignty), 120B (committing the above offences as part of a criminal conspiracy), and under the UAPA Section 20 (member of a terrorist organization).


 22. I could get bail only after 3 years and 8 months, that too, only because the UAPA invoked against me and my co-accused was the 2004 version, not the 2008 one. The others who were subsequently arrested from home, a court premises and one from a railway station a year or so later, were respectively, Gopal Bhatt, Dinesh Pandey and Chandrakala, all well-known social activists of Uttarakhand. 3 others were proclaimed as absconders. All the 3 who were arrested after me were released first, and then I too was released on bail on August 21, 2011.


23.  The case with Cr. Case No. 3222/2007 was taken up for trial 8 months later, as S.T. No. 83/2008, and the trial has not yet concluded. Had I not been framed up in another case, the Uttarakhand case could have ended (in acquittals) latest by the end of 2013.


24.  Ever since my incarceration at Central Prison Nagpur, I have not been able to attend any of the trial hearings in Uttarakhand. The Maharashtra Police refuses to provided me the necessary escort to travel to Uttarakhand, this being one of the main reasons for the trial being held up these past 4 months. It is likely to be so for an indefinite or uncertain time period.


25.  There would be calculations and speculations on the part of both the police IOs, and indeed their superiors, as to how one case could be made use of to lend weight and credibility to the other.


On the basis of the above series of facts, circumstances and observations that are humbly placed before all of you, I would urge you, friends, to direct your energies and passions now at the basic causes of the above tribulations, rather than expecting the officials of the Indian state to take any serious cognizance of your appeals not to torture Hem and me, to ensure a fair trial, or to punish the officials responsible for my/our torture in Maharashtra or in Uttarakhand State. Even if the issue be primarily of the nature of civil and democratic rights, in other words, human rights, the targets, in accordance with the basic causes of such adverse occurrences, ought to be socio-political. It is the anti-people nature of the Indian state, and its various organs that ought to be brought into question. As the country goes to the polls to reconstitute its parliament, would it not be pertinent to ask as to why no vote-garnering political campaign, not even that of the “common man’s” Aam Aadmi Party has an agenda to demilitarize the state’s operations against its own people, and to reverse this trend of the last 8 to 10 years, which has led to the incarceration of not less than 3000 alleged Maoists, an overwhelming majority of them framed up with fabricated charges and brutally tortured and inhumanly treated in both police and judicial custody.


With these concerns, it would serve a larger cause if the thousands who have reportedly expressed moral support to me and Hem Mishra would bombard the powers -that- be in New Delhi, Mumbai, Dehradun, Raipur, Ranchi, Patna, Kolkata, Lucknow, Chandigarh, Bhopal, Ahmedabad, Hyderabad, Bangaluru, Bhubhaneshwar, Chennai, Thiruvananthapuram and Guwahati with millions of letters and slogans to :-


1.  Repeal the U.A.P.A. or at least withdraw its 2008 and 2004 amendments.


2. Withdraw the ban on organizations which are attempting to lend a voice to the impoverished and deprived lot, irrespective of whether they resort to counter-violence against state repression.


3.  Redefine terrorism! Get out of the nomenclature imposed on the world by the likes of Bush and Obama, and Putin and Angela, and Manmohan Singh and Narendra Modi! Do not equate revolutionary violence with terrorism!


4. Release all the alleged Maoist prisoners incarcerated as a result of the draconian laws and amendments, and all other innocents framed up for political reasons and as part of the conspiracies of intelligence agencies, the bosses of ATS’, IBs and the NIA!


5. Stop forthwith government sanctioning of all prosecution of persons accused under UAPA, especially those not active in combatant roles and common villagers, adivasis and dalits, and ordinary women.


6.  Ensure speedy trials for all UAPA accused. Summon prosecution witnesses without delay.


7. Ensure production of all UAPA accused in their cases pending in courts of various States and districts. Stop using “security reasons” as the excuse to delay and deny trials.


8. Accord political prisoner status in all States on the lines of the West Bengal Correctional Services Act.


9.     Amend Jail Manuals in all States on the lines of the West Bengal Correctional Services Act.


10.   Do not adopt video conferencing as the means to conduct court trials. Stop the practice forthwith, wherever in force.


11. Stop erecting barriers in the form of wire meshes, glass panes, etc. in visitors’ enclosures in prisons in the name of security. Let jail interviews be held in a humane manner. Allow UAPA accused the right to access the Press.


12. Implement forthwith the provisions of the International Covenants on Civil and Political Rights, on Prisoners’ Right, and on Detention Centres.


Let this be an open-ended campaign, and do keep me informed, please.


In Solidarity,

Prashant Rahi 


Address for correspondence:

PRASHANT RAHI


UNDER TRIAL SECTION, BARRACK No. 8,


CENTRAL PRISON, NAGPUR-40020