Tuesday, June 25, 2013

कौन है मूलनिवासी ?

 कँवल भारती की फेसबुक पर से कुछ पोस्ट क्रमवार :


(1) :  21 जून को मैंने मुरादाबाद में वामन मेश्राम जी के साथ उनके भारत मुक्ति मोर्चा के कार्यक्रम में भाग लिया. कार्यक्रम से पहले गेस्ट हाउस में उनसे निजी मुलाकात हुई, करीब डेढ़ घंटे तक उनसे राजनीति और साहित्य पर बातचीत हुई. उनका इरादा एक भव्य और बड़ी पत्रिका निकालने का है, जो वैचारिकी-आधारित हो. वे चाहते हैं कि मैं उसकी जिम्मेदारी संभालू. मेरी क्षमता पर उनका विश्वास करना मुझे अच्छा लगा. पर मैं अभी बहुत से कारणों से स्वयं को असमर्थ समझता हूँ.
कार्यक्रम में वामन मेश्राम जी का भाषण वही था, जो मैं पहले नागपुर में भी सुन चुका था. भारत में आज़ादी की लड़ाई आज़ादी की लड़ाई नहीं थी, वरन वह ब्राह्मणों की आज़ादी की लड़ाई थी. भारत में केवल ब्राह्मणों का वास्तिविक प्रतिनिधित्व है, दलितो-पिछडों का वास्तविक प्रतिनिधित्व नहीं है.
श्रोताओं में सरकारी कर्मचारी और ट्रेड यूनियनों के लोग ही थे, जिनका एकमात्र और एक सूत्रीय कार्यक्रम पदोन्नति में आरक्षण के सिवा कुछ नहीं है. इस कार्यक्रम में मुझे आम आदमी की कोई भागीदारी नजर नहीं आयी.
बहुजनों के सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर कोई बातचीत नहीं हुई. मैंने अपने भाषण में शिक्षा का मुद्दा उठाया, जिसका निजीकरण कर दिया गया है और कहा कि सरकार द्वारा शिक्षा को आम आदमी की पहुँच से दूर कर दिया गया है. मैंने सवाल खड़ा किया कि इतनी बड़ी संख्या में अशिक्षा के रहते दलित-पिछड़ा समाज का क्या भविष्य हो सकता है? मैंने यह प्रश्न भी मंच से उठाया कि भारत मुक्ति मोर्चा के एजेंडे में यदि निजीकरण से मुक्त करने का मुद्दा नहीं है, तो बहुजन समाज के लिए उसका कोई महत्व नहीं है. मेरी बात का समर्थन वहाँ किसी ने नहीं किया, वामन मेश्राम जी ने भी नहीं.
मुझे लगता है, मेरी यात्रा यहीं समाप्त हो गयी.

(2) :  कौन है मूलनिवासी?


दलितों में एक नया संगठन बना है, जो मूलनिवासी की अवधारणा को लेकर चल रहा है. इस संगठन के लोग अभिवादन में भी ‘जय भीम’ की जगह ‘जय मूलनिवासी’ बोलने लगे हैं. ये लोग कहते हैं कि वे मूलनिवासी हैं और बाकी सारे लोग विदेशी हैं. क्या सचमुच ऐसा है? अगर इनसे यह पूछा जाये कि किस आधार पर आप अपने को मूलनिवासी कहते हैं, तो इनके पास कोई जवाब नहीं है. अधकचरे तर्क देते हुए ये ब्राह्मण-शूद्र की शब्दावली के आधार पर उन्हीं धर्मशास्त्रों का हवाला देना शुरू कर देते हैं, जिन्हें ऐतिहासिक दृष्टि से कभी मान्यता नहीं मिली. दरअसल इनके नेताओं ने जो सैद्धांतिकी बना ली है, उसी को इन्होने रट लिया है.

अगर वर्ण का अर्थ रंग है, तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का अलग-अलग रंग होना चाहिए था. ब्राह्मण गोरे होते, क्षत्रिय नीले होते, वैश्य पीले होते और शूद्र काले होते. पर क्या ऐसा है? दो ही रंग हैं—गोरा और काला. सभी वर्णों में ये दोनों रंग मिल जायेंगे. अगर दलित-शूद्र भारत के मूलनिवासी होते, तो ये सभी वर्ण काले रंग के होते और बाकी सारे लोग विदेशी होने के कारण गोरे रंग के होते. पर क्या ऐसा है? ब्राह्मणों में कितने ही काले और भयंकर काले रंग के मिल जायेंगे और दलितों में कितने ही गोरे और एक्स्ट्रा गोरे रंग के मिल जायेंगे. हजारों वर्षों के मानव-समाज के विकास के बाद आज अगर कोई यह दावा करता है कि वह मूलनिवासी है, तो वह बहुत बड़ी गलतफहमी का शिकार है. अगर कोई यह मानता है कि आर्य और अनार्यों में रक्त-मिश्रण नहीं हुआ है, तो वह सबसे बड़ा मूर्ख है. आज रक्त के आधार पर कोई भी अपनी नस्ल की शुद्धता का दावा नहीं कर सकता.
मूलनिवासी संगठन के लोग अगर डा. आंबेडकर को मानते हैं, तो उन्हें यह भी समझना चाहिए कि डा. आंबेडकर ने आर्यों को विदेशी नहीं माना है. उन्होंने इस सिद्धांत का खंडन किया है कि आर्य बाहर से आये थे. डा. आंबेडकर इस सिद्धांत को भी नहीं मानते कि आर्यों ने भारत पर आक्रमण करके यहाँ के मूलनिवासियों को गुलाम बनाया था. वे कहते हैं कि “इस मत का आधार यह विश्वास है कि आर्य यूरोपीय जाति के थे और यूरोपीय होने के नाते वे एशियाई जातियों से श्रेष्ठ हैं, इस श्रेष्ठता को यथार्थ सिद्ध करने के लिए उन्होंने इस सिद्धांत को गढ़ने का काम किया. आर्यों को यूरोपीय मान लेने से उनकी रंग-भेद की नीति में विश्वास आवश्यक हो जाता है और उसका साक्ष्य वे चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था में खोज लेते हैं.” ब्राह्मणों ने इस सिद्धांत का समर्थन क्यों किया? इसका कारण डा. आंबेडकर बताते हैं कि ब्राह्मण दो राष्ट्र के सिद्धांत में विश्वास रखता है. इस सिद्धांत को मानने से वह स्वयं आर्य जाति का प्रतिनिधि बन जाता है और शेष हिंदुओं को अनार्य कह कर वह उन सबका भी श्रेष्ठ बन जाता है. यही कारण है कि तिलक जैसे घोर सनातनी ब्राह्मण विद्वानों ने इस सिद्धांत का समर्थन किया.
दलित इस सिद्धांत को क्यों मानते हैं, यह समझ से परे है. पर, उनका मूलनिवासी दर्शन पूरी तरह डा. आंबेडकर की वैचारिकी के विरोध में है. मेरी दृष्टि में यह दलित-पिछड़े वर्गों में एक बड़े रेडिकल उभार को रोकने का षड्यंत्र है. इस षड्यंत्र का सूत्रधार पूंजीवाद है, जो फंडिंग एजेंसी के रूप में भारतीय और विदेशी दोनों हो सकता है. हमारे सीधे-साधे दलित-जन अपने नेतृत्व पर आंख मूँद कर विश्वास करते है. अपने आरक्षण को बनाये रखने के लिए वे उन्हें अपना तन-मन-धन तीनों का अर्पण करते हैं. वे बेचारे नहीं जान पाते कि उनके मुखिया उन्हें काल्पनिक शत्रु से लड़ा कर दलित आन्दोलन को भटकाने का काम कर रहे हैं.
मूलनिवासी संगठन हो या भारत-मुक्ति-मोर्चा, वामसेफ हो या कोई और ‘सेफ’, ये सारे के सारे संगठन इसलिए फलफूल रहे हैं, क्योंकि कहाबत है कि जब तक बेवकूफ जिंदा है, अक्लमंद भूखा नहीं मर सकता. जो लड़ाई डा. आंबेडकर ने अपने समय में लड़ी थी, ये संगठन उसी कीली के चक्कर काट रहे हैं. आंबेडकर की जिस लड़ाई को आगे बढ़ना था, उसे पूंजीवाद के दलालों ने आज वहीँ रोक दिया है.
23 जून 2013

(3) :   बाबासाहेब डा. आंबेडकर ने कहा था कि दलित वर्गों के दो शत्रु हैं--एक ब्राह्मणवाद और दूसरा पूंजीवाद. हमारे दलित संगठन ब्राह्मणवाद के खिलाफ गला फाड़-फाड़ कर चिल्ला रहे हैं, पूंजीवाद के खिलाफ मौन धारण किये हुए हैं. क्यों? क्या पूंजीवाद शत्रु नहीं है? क्या बाबासाहेब गलत थे?


(4) :   भारत के दलित आंदोलन को ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद ने गोद ले लिया है. दलित संगठनों के मुखिया विदेश घूम रहे हैं और उनसे कोई पूछने वाला नहीं है कि उनकी फंडिंग कहाँ से हो रही है?


(5) :   अपने नेताओं से पूछो कि हम किस तरह मूलनिवासी हैं? उनसे तर्क करो. उनके गुलाम मत बनो. सरकारी कर्मचारी और भ्रष्ट अधिकारी तुम्हारे नेताओं के आसान शिकार हैं. उन्हीं के पैसे पर वे मौज मार रहे हैं.


(6) :  स्वामी सहजानंद लिखते हैं कि उन्हें समाजवाद की प्रेरणा भगवद्गीता से मिली. भारत में सभी समाजवादियों का यही हाल है. धर्म में आस्था से बंधे हुए लोग क्रान्ति कर ही नहीं सकते, वे केवल ढोंग कर सकते हैं, जो उन्होंने किया. इसीलिए यहाँ समाजवाद फेल हुआ.

 
Kanwal Bharti      :-  कँवल भारती